भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार
व्याकरण की दृष्टि से 'भूख' सिर्फ स्थिति-सूचक संज्ञा है, जबकि जीवन के लिए 'भूख' अपरिहार्य स्थिति है। भूख और भोजन एक सिक्के के दो पहलू हैं। जीवन के लिए दोनों की महत्ता बराबर है।
दरअसल मानव-जीवन में चन्द जरूरतें जन्म के साथ ही पैदा हो जाती हैं शेष अधिकाधिक मनुष्य द्वारा उत्पन्न की गई आवश्यकताएं होती हैं। जीवन के लिए अनिवार्य चार आवश्यकताएं हैं- श्वशन, उत्सर्जन, भोजन, संवेग। इन चार के अतिरिक्त सभी आवश्यकताएं मनुष्य द्वारा स्वयं उत्पन्न की गई होती हैं। भोजन का अर्थ है पोषक खाद्य पदार्थ।
शरीर के अन्तः तंत्र द्वारा, स्वयं के लिए सूक्ष्म पोषक-तत्वों की आपूर्ति हेतु खाद्य सामग्री की आवश्यकता को महसूस किया जाना ही "भूख" की अवस्था है। लगभग निश्चित अंतराल पर लगातार महसूस की जाने वाली वह अवस्था है, जिसमें शरीर को कुछ पोषक तत्वों/पदार्थो की जरूरत होती है।
भूख के साथ कई भ्रम फैले हुए हैं जैसे- भूख और कुपोषण में अंतर न करके कुपोषण को भूख समझना। शरीर को आवश्यक मात्रा में भोजन का न मिलना भूखा रह जाना है और भोजन में आवश्यक तत्वों का न होना कुपोषित भोजन कहलाता है। इसीप्रकार भरपेट भोजन न मिलने से दुबले व्यक्ति को कमजोर बोला जाता है और तत्वों की कमी अथवा अधिकता से कमजोर व्यक्ति को कुपोषित बोला जाता है।
भूख और भीख में भी निकट का नाता है। भूख मिटाने के लिए माँगना ही भीख-माँगना कहलाता है। भीख बिना शर्त दी और ली जाती है। बिना शर्त तो दान भी दिया जाता है। दान माँगा नहीं जाता जबकि भीख माँगने वाला कोई न कोई होता ही है। बिन माँगे दिया जाने वाला धन या पदार्थ भीख नहीं दान ही होगा। भारत में न तो दान लेने देने वालों की कमी है न ही भीख माँगने वालों की। गली-गली में टहलते मिल जाएंगे भिखारी। दान लेना और भीख माँगना दोनों ही व्यवसाय बने हुए हैं। एक तरफ भीख माँग कर भोजन जुटाने को तथा छत व घर विहीन रहने को अभिशप्त आबादी है, तो दूसरी तरफ बड़े महलों, बँगलों में रहने वाली ऐसी आबादी भी है जो आजाद भारत मे भी भ्रष्टाचार व शोषण करना अपना अधिकार समझती हैं। घर या छत विहीन लोगों और महलों व बँगलों में रहने वालों के बीच की हर आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक खाई को मिटाने की कोशिश करना सरकारों का एक बड़ा दायित्व होता है। नीतियाँ बनाकर सरकारों की तरफ से चाहिए कि अन्यथा अभाव और अन्यथा प्रभाव दोनों खत्म करने का सामाजिक व विधिक प्रयास किये जायें।
एक कहावत है कि- काम धार का है, नाम तलवार का है। ठीक इसी प्रकार लोग सतही दृष्टि के कारण आरोप भूख पर लगाते हैं, जबकि कारस्तानी लालच और असुरक्षा-भाव की होती है। बेईमानी व भ्रष्टाचार का कारण प्रायः पेट व भूख को बताया जाता रहता है जबकि गम्भीरता से विचार किया जाए तो मिलता है कि भूख के कारण कोई चोरी तो कर सकता है, पर भूख से पीड़ित की तिजोरियाँ कभी भर ही नहीं सकतीं। तिजोरियाँ भरने का कारण तो लालच ही होगा अथवा असुरक्षा का भाव। मन में उपजे असुरक्षा भाव के कारण संग्रह की जरूरत महसूस होती है और कालालन्तर में प्रवृत्ति बन जाती है।
सरकार का काम होता है कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण करे ताकि जनता में किसी तरह का असुरक्षा-भाव पनपने न पाए। सरकार का दूसरा काम होता है कि उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशा और विश्वास मिटने न पाए।
सम्पूर्ण संसार एक अत्यंत कठिन दौर का सामना कर रहा है। व्यापारिक प्रवृति के लोग कालाबाजारी का जो खेल खेल रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि लाभ कमाने की इच्छा रखने वालों के लिए देश, समाज, मानवता, का कोई मूल्य नहीं होता है। व्यापार का अभीष्ट सिर्फ और सिर्फ अधिकाधिक लाभ। इन लाभ कमाने वालों में एक भी ऐसा नहीं होता है जो पेट की भूख मिटाने के लिए मानवता को नज़रंदाज़ करता हो, बल्कि ऐशो-आराम के लिए करते हैं कालाबाजारी। लोकतंत्र में आने-जाने वाली सरकारों की प्राथमिकताओं में परिवर्तन से व्यवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं। एक तरफ भूख अपना तांडव करती है दूसरी तरफ भूख के नाम पर लोग भी तांडव करते नजर आते हैं। ऐसे में देश, संविधान, समाज और मानवता सब के सब दरकिनार हो जाया करते हैं। भूख खुल्लम-खुल्ला अट्टहास करती है। जिम्मेदारों के द्वारा किये जाने वाले प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा से अधिक कुछ नहीं होते। आम जन सिर्फ झेलता है और बर्दास्त करता है।
देश की बड़ी आबादी के पास भूख मिटाने को जरूरत भर का भोजन उपलब्ध नहीं रहता, दूसरी तरफ चंद लोगों के भंडारों में खाद्यान्न सड़ जाता रहा है। भूख का इतिहास भूगोल नागरिकशास्त्र अर्थशास्त्र, समझने वाले भी नासमझ बने रहते हैं। भूख से निपटने का कोई ठोस विचार या योजना किसी के पास नहीं है। बुजुर्गो ने कहा है कि- किसी को भोजन कराने से बेहतर है उसे भोजन जुटाने का हुनर देना। ध्यान रहे मनुष्य द्वारा उत्पन्न आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाने पर जीवन को कोई खतरा नहीं होता है, किन्तु जन्म के साथ उत्पन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना जीवन ही सम्भव नहीं है। इसके बावजूद ससमय भूख मिटाने की योजना पूरी कायनात में किसी व्यवस्था के पास नहीं है। सबसे के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था अगर है तो सिर्फ जंगल में, यानी प्राकृतिक जीवन-जगत में। किन्तु हम मनुष्यों ने मानव जीवन को सभ्यता-संस्कृति के नाम पर प्रकृति से दूर करते चले आये हैं। भोजन के संदर्भ में गौर करें तो पता चलता है कि जंगल में सभी जीव जंतुओं के लिए प्राकृतिक भोजन उपलब्ध है, जो किसी के स्वामित्व में नहीं है यानी सभी के लिए अबाध सुलभ है। हम मनुष्य भी बहुत लम्बे समय तक (प्रागैतिहासिक काल) तक इसी प्राकृतिक भोजन पर निर्भर रहे हैं। मनुष्य के लगातार बढ़ते ज्ञान, विवेक, विशेष सौंदर्य बोध, तथा मनमानी की आदत व सृजनशीलता ने मनुष्य को प्रकृति से दूर एक अलग तरह का कृत्रिम संसार रचने को प्रेरित किया है। परिणामस्वरूप मनुष्य के भोजन में जंगल के उत्पाद कम, कृत्रिम उत्पाद अधिक हैं। कृत्रिम से आशय उबले, पकाए हुए भोजन से हैं।
जंगल मे जीव भूख से शायद ही मरते हों, क्योंकि प्राकृतिक भोजन पर्याप्त उपलब्ध है। कृत्रिम भोजन तो उगाना, बनाना, पकाना पड़ता है। वर्तमान में यदि अन्य जीव जंतुओं के लिए भोजन की समस्या उत्पन्न भी हुई है तो भी मनुष्य की अनेक कृत्रिम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नष्ट किये गए जंगलों के कारण। मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के चक्कर में जंगल ही क्या विभिन्न पारिस्थितिकीय असंतुलन उत्पन्न हुए हैं। इंसानी भूख की बहुत ही गजब ऊँचाई और गहराई है। मनुष्य की भूख के उत्कर्ष को हवस कहा जाता है। हवस भूख की वह अवस्था है जहाँ मनुष्य उचित अनुचित भूलकर सिर्फ और सिर्फ भूख मिटाने को जुट जाता है। भूख चाहे धनार्जन की हो या सम्मानार्जन की, पेट की हो या शरीर की। भूख को हवस में परिवर्तित होने से रोकने का एक उपाय है संन्तुष्टि। संन्तुष्टि की स्थिति, संस्कारों के माध्यम से उद्भूत समझदारी से प्राप्त होती है। स्मरण रहे संस्कार और प्रवृत्तियों का सबसे अधिक प्रभावकारी काल बचपन ही होता है।
काश! भूख नामक एहसास अस्तित्व में न आया होता तो भोजन की आवश्यकता ही न होती, किन्तु घूसखोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार और कदाचार तब भी होते, क्योंकि पेट की भूख के अलावा अन्य किसी भी भूख यानी हवस का न कोई समाधान है न ही अन्त।