एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता
"वेलेंटाइन डे भारतीय नहीं है इसलिए न मनाएं" ऐसी आवाजें आने लगती हैं वेलेंटाइन डे से पहले। इसके साथ कुछ बकवास भी परोसते रहते हैं लोग। विदेशों (जेनेवा, अमेरिका, लंदन) में बैठकर तय किये गए अनेक दिवस मनाने के लिए भारत सरकार बजट खर्च करती है। और कुछ लोग सिर्फ भारतीयता की कोरी बकवास को ढोते रहते में ही गौरव महसूस करते हैं। ये मानक ही निराधार है और ये बात हवा हवाई है कि अमुक चीज भारतीय नही है तो भारतीय ध्यान न दें, उसको अपनाएं न। अरे भाई पोलियो दवा भारत ने बनाई है क्या ? ये मोबाइल व पार्ट्स भारत बना रहा है क्या ? अमित्र देश से लड़ने के लिए हथियार विदेशों से खरीद रहे हैं ? विदेशी कपड़े व खिलौने भारतीय बाजारों की शोभा हैं। विदेशी व्यंजनों को बड़े ही चाव से खाया जा रहा है...आदि आदि।
क्या समझ रहे हैं भारतीय युवाओं और छात्रों को ऐसी सलाह देने वाले लोग ? दूसरों के चिंतन की साजिश के शिकार ऐसे लोग खुद चिन्तन नहीं करते हैं और विद्वान की तरह उपदेशक हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर तो इधर उधर से लेकर परोसने की आदत आम हो गई है। अपनी रसोई में पकाकर परोसो तो स्वाद ही अलग है।
पुलवामा शहीदों को नमन करें और वेलेंटाइन डे का बहिष्कार। ऐसा खूब प्रचारित होता है। ऐसा कहने वाले लोग एक बात अपने जहन में साफ करें कि वेलेंटाइन डे मनाने पर आपत्ति है या पुलवामा शहीदों को नमन जरूरी है ?
वेलेंटाइन डे न मनाएं अच्छी बात है। मनाएं तो भी कुछ बुरा नहीं है। किंतु भारतीय नहीं है इसलिए न मनाएं ये तर्क देना बकवास है और कुछ नहीं। लोगों को तंगदिल न बनाया जाए। भारत का संविधान बन रहा था तो भी विदेशी संविधान से परहेज नहीं किया गया। अनेक तत्व गैर भारतीय संविधान से लिये गए हैं। इसलिए कि भारतीय परम्पराओं व संस्कृति में आधुनिक विकास के लिए जरूरी तत्व थे ही नहीं इसलिए गैर भारतीय दर्शन को स्थान देना पड़ा। भाषा विकास के सिद्धांत भी विदेशी शब्दों से परहेज नहीं करते हैं। किन्तु कुछ लोग आए दिन भारतीय न होने के कारण मनाने को लेकर बकवास परोसते रहते हैं। जब किसी को भी अपने घर परिवार धर्म संस्कृति परम्परा, प्रान्त/देश की सीमाओं के भीतर मनवांछित नहीं मिलेगा तब तब लोग इन सीमाओं के बाहर जाएंगे। चाहे स्वाद का मामला हो, या मनोरंजन का, चाहे वस्तु उपयोग का मामला हो या तकनीक प्रयोग का।
दीवाली में जुआ होने लगा है तो दीवाली न मनाई जाए या जुआ न हो,,,, किस बात पर फोकस किया जाय....? होली में दारू पी जाने लगी है हुड़दंग होने लगे हैं तो होली न मनायें या दारू न पीने हुड़दंग न करने पर फोकस किया जाना चाहिए ?
अरे भाई दिमाग को भी कभी कभी साफ करना चाहिये, जहनियत को भी। पर कुछ लोग हैं कि जब देखो भारतीय भारतीय की रट से ही भारतीय होने का गर्व महसूस करते हैं। भारतीय होने का अर्थ होता है भारत के संविधान का सर्वोच्च स्वीकार। पर बहुत कम लोग हैं जो संविधान की मर्यादा और संविधान का व्यवहार में पालन करने को प्राथमिकता देते हैं अन्यथा बहुधा लोग अपनी पसंदगी व अपनी मनमानी के आगे भारतीय संविधान को छोटा और कमतर मानते हैं। ये नंगा सच है और ऐसा नंगा सच उघारने वाला राष्ट्र और संस्कृति का दुश्मन भी घोषित किया जा सकता है..? क्योंकि ये तो मैं (प्रदीप सारंग) खुद ही स्वीकार कर रहा हूँ कि बहुधा लोग अपनी मनमानी और पसन्दगी के लिए खुल्लमखुल्ला संविधान का उल्लंघन करते पाए जा रहे हैं। तब भारतीयता कहाँ रहती है...? जो भारत के कानून का पालन अपने जीवन मे नहीं कर रहे हैं वे भारतीयता के नाम पर कुछ भी बोलने के अधिकारी नहीं हैं फिर भी बेशर्मी पूर्वक बकवास परोसते रहते हैं। भारत के संविधान में लिखित कानून का उल्लंघन करने वालों की आबादी कम नहीं है। इसी देश के लोग हैं और भारतीयता की कोरी बकवास करने वाले लोग सड़कों पर बिना हेलमेट, बिना सीटबेल्ट के निकलते हैं। क्यों क्योंकि इनकी पसन्दगी और मनमानी के आगे कानून गौण है। ऐसे ही मुद्दों पर भारतीयता की दुहाई देने वाले व्यवसायी टैक्सचोरी में भरपूर दिमाग लगाकर कानून से आँख मिचौली खेलते हैं, ऑफिसों में बैठकर घूस वसूली करते हैं, सड़कों और होटलों में छिछोरापन दिखाते हैं ऐसा करने वाले भारत के ही हैं। जिस तरह के वस्त्र आज की महिलाएं पहनने को उतावली हैं कोई रोक ले अपने घरों में। मुझे निजी तौर से प्रदर्शन संस्कृति से कोई आपत्ति नहीं। इसलिए कि आचरण पर फोकस करना है न कि पहनावे पर। कुछ सवाल और भी हैं जुए में द्रोपदी को दाँव पर लगाने की सोंच व सीता अपहरण जैसी सोंच क्यों पैदा हुई ? अग्नि परीक्षा की आवश्यकता क्यों पड़ी ? सती प्रथा का शुभारम्भ क्यों हुआ था ? गर्भ में बच्चियों को मार देने की सोंच क्यों उत्पन्न हुई ? इन सबके पीछे भारतीय संस्कृति सोंच और परम्परा के ही तत्व रहे हैं न। पुरातन से चले आ रहे लिंग आधारित भेद वाली सोंच ने ऐसी अनेक प्रथाओं को जन्म दिया है। आज इसी लिंग आधारित विभेदकारी सोंच को समाप्त करने की जरूरत है न कि बढ़ाने की। एक सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि रात के अँधेरे में सड़क पर चलते हुए एक अकेली महिला के मन में अधिक डर किससे रहता है किसी जानवर से या जानवरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य से ? भारतीयता की बात करने वाले महान पुरुषों, इस सवालों के जवाब में क्या बोलोगे ? फोकस आचरण पर करना होगा ? बकबक पर नहीं। लिंग आधारित विभेदकारी सोंच समाप्त किये बिना आचरण में परिवर्तन संभव नहीं। आचरण बदलना है तो भेदकारी सोंच बदलो। भारत का कानून लिव इन रिलेशन को मान्यता देता है। यानी सहमति के आधार पर किन्ही दो वयस्क महिला और पुरुष को एक साथ आने जाने, बातें करने, एक साथ रहने को भी गैरक़ानूनी नहीं मानता है तो लोग वेलेंटाइन डे पर हो हल्ला क्यों मचाते हैं ? जिन्हें ये सब पसंद नहीं वे ऐसे कानून के खिलाफ हो हल्ला मचाएं न कि वेलेंटाइन के खिलाफ। वेलेंटाइन एक दिन का है पर कानून ने हर रोज ऐसे आचरण को मान्यता प्रदान की हुई है।