झरिहख
आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही। ईका येकु कारन इहौ रहा कि हम घर की छत पर बने सीमेंटेड-टीन सेट के नीचे सोइत है। पानी की बड़ी बड़ी बूँदन के टीनसेट पर गिरै से यही तिना केर, झमझम-झमझम आवाज निकरत रही। आजु कुछ अलग तिना केरी आवाज से कुछ अटपट लाग और जल्दिन खुमारी भागिगै। हमका लाग कि आजु जानौ झरिहख परि जाई।
हमरी घरैतिन रोजै छत पर याक बरतन मा पानी भरि देती हैं अउर राति केर बची बासी चावल, रोटी रखि दियत हैं। जेहिका चुगै मेर-मेर की चिरई अउती हैं। नाश्ता भोजन करती हैं अउर जलपान करती हैं। दाना चुगै मा लगातार चह-चहावा करती हैं।
आजु सबेरेन से बारिस होय रही है। 10 बजि रहा है। अबहीं तक देखे से तौ इहै अनुमान है कि आजु झरिहख परी। पिछले कइव दिनन मा आंशिक-झरिहख जइस मौसम रहा है। हम लोगन के छुटपने मा तीन-तीन दिन के झरिहख परत रहैं। हमका ठीक से यादि है कि चिरइन का दाना चुनै भर का समय नहीं मिलत रहा कि निकरि सकैं।
गाँव से न जुड़े रहै वाले अउर अवधी न बोलै समझै वाले लोगन तईं झरिहख नवा शब्द आही। झरिहख मतलब न पानी बन्द हुवै न बरसबै करै। हल्की हल्की फुहार परा करै। यानी धीमी बारिस होत रहत है। जब ई तिना कै बारिस चारि छः घण्टा होत रहत है तब ई तिना की हल्की बारिस का झरिहख कहा जात है।
झरिहख मा सबका दिक्कत होइन जात है। हमरे छुटपने मा गाँव भर मा दुई चारि घर छोड़ि कै सबके घर कच्चेन हुवत रहे। जब जब झरिहख परत रहा तब तब हर गाँव मा दुई चारि दीवालै जरूर गिरि जाती रहैं। दुई-तीनि दिन के झरिहख मा लोग घर से निकरै न पावैं तब लोग ऊबि जात रहे।
तब गैस चूल्हा केर ईजाद नहीं भवा रहै यहिसे सबके घरन मा खाना चूल्हे पर बनत रहा। झरिहख मा सूखि लकड़ी खतम होइ जाय। अम्मा जब खाना बनाय चुकैं तब चूल्हे कै आगि बाहर निकारि कै रखि दियैं तब हम सब आपनि आपनि कपड़ा सेंकि कै सुखाइत रहै।