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अवधी गद्य

सुघरी

लेखक: प्रदीप सारंग • 14 Sep 2026

मेला जाय की खुशी मा, गोबर की खेप लइकै जाय रही 'सुघरी' के कदमन की चाल आजु अपने आपै कुछ बढ़ी हुई है। बीती शाम का खाय के बखत अम्मा जब लरिकन का नाग बाबा मेला देखाय लावै खातिर वकालत किहिन तौ बप्पा वही पुरनके अंदाज मा हामी भरिन और चिकोटी काटत भये टून भी बोलिन कि मन तो तुमरौ होई घूमै का। "मेटकी-प्रसाद" लवहिन का है, तौ तुमहिन चली जाव। मुल, काने नकुना और गटई मा जौन सोना चाँदी चमके हौ, उतारि कै जायो। पिछली बार मेंला मा जंजीरै, नथुनी, बाला, झाला आदि खूब नोचे गए रर्है। कइउ छिनइया मेहरुआ-मर्द, रँगे-हाथ पकरे गे रहैं। लाउडस्पीकर से पुलिस बतावत भी रहै कि सोना चाँदी के जेवर पहिर कै मेला ना आवैक चाही। अगर कोई पहिर कै आवत है तौ खुदै जिम्मेदारी उठावै और अपने जेवरन का विशेष ध्यान राखै।
सुघरी का अपने सिर पर रखी गोबर कै खेप आजु वाकई हल्की लागि रही है। मन मा लड्डू फूटि रहे हैं कि आजु सर्कश देखैक मिली और हिंडोलना झूलैक भी। जलेबी सोचि कै तौ मुहिमा पानिन आय गवा। पिछली बार जलेबी खाय के चक्कर मा देर होइगै रहै, जलेबी खातै मा अचानक पानी बरसै लाग जेहिसे चारिउ तरफ पानी भरिगा रहै। अतना पानी बरसा अतना पानी बरसा कि सब मजा किरकिरा होइगा रहै। मेला की सड़कन पर टिहुनिन तक पानी बहत रहै। का सर्कश, का हिंडोलना, सब बन्द। भिजतै घर आवै का परा रहै। मेला क्यार मजा तौ किरकिरा भवा, मुल भीजत आवै मा, खलभल-खलभल चलै मा, एक दुसरे पर छपाक लगावै का, जौन मजा आवा रहै ऊ कौनौ कम नही रहै। सबसे ज्यादा मजा तौ तब आवा जब सबका हिदायत दियत चलै वाली बड़की चाची बिछुलि कै गिरि परीं। सबै दौर परे उठावै खातिर। और लरिकेहरी भरि ताली बजाय के जौन हँसिस है कि मानौ इनाम मिलिगा हुयै। दादा खुदौ आपनि हँसी रोकि ना पाइन मुल चाची कै नाराजगी से बचै की खातिर लरिकन का फटकारै लागि रहैं। आजौ तक जब ई सब यादि आवत है तौ मनु मुस्काय लागत है।
अबकी बार मेला के रस्ते मा नवा बना हाईस्कूल देखै का लालच भी सुघरी के दिमाग मा जरूर है काहेकि अगले साल कक्षा-9 यही स्कूल मा पढ़ै का है। पहिलेन साल गाँव की आधा दर्जन बिटेवा यही स्कूल मा दाखिला लिहिन हैं, और अच्छी पढ़ाई का बखान करि रही हैं। बखान सुनि सुनि कै लरिकन बिटेवन का मन बना है कि यही स्कूल मा पढ़ैक है।
सुघरी का जइसन नाम है वइसन सुन्दर रूप है और वइसन सुन्दर बोली बानी भी। ई धरती पर अपनी तरह कै या अकेलि बिटेवा है। यहि के दिल दिमाग मा पता नहीं कइसन याक बात बैठिगै है कि लड़की-लड़िका मा कछु भेद नहीं है। सिर्फ बनावट मा अन्तर है। अन्दर से सब एकै तरह के हैं। सुघरी बहस करत है कि "दुई अदमी हैं एक गोर एक काला, एक दिव्यांग एक स्वस्थ। तौ का रंगभेद के कारन या विकलांगता के कारन दूनउ के दुख-दर्द के एहसास मा कौनउ अन्तर आई..? सपना, सोच विचार आचरन आदि मा कौनौ अन्तर का रंग भेद के कारन या विकलांगता के कारन आई...? ई दूनउ सवालन का जवाब है- नहीं।" विकलांगता यानी शरीर की बनावट के कारन सिर्फ चलै-फिरै, उठै-बइठै मा अन्तर आय सकत है ना कि सोच, विचार, सपना, और एहसास मा। यहै भूल सगरे समाज से होइ रही है। अब सुघरी केर तिसरा सवाल आहै कि "जइसन शरीर के बनावट से भी कछु विशेष अन्तर नही हुअत है वइसन लिंग भेद के कारन भी कौनउ अन्तर नाही हुवत है। और जौन अन्तर देखात हैं उइ लिंग भेद के कारण नहीं बल्कि विशेष संकुचित सोच के कारण हुअत हैं। अदमी की सोच है कि ऊ बिना ताज के राजा आहै। मेहरुवन केरि सोच है कि उइ राजन के आदेश का पालन करै वाली दासी और रानी आहैं।" सुघरी कहत है कि "हम और सब मेहरुवन बिटेवन की तरह नहीं हन। हमका कोउ हाँकै तब हम चलब, यू कबौ न होई। हमका जौन नीक लागी वहै करब। मुल गलत कुछ न करब, न गलत कुछ सुनब। समझ मा ना आई, तौ बहस जरूर करब। बड़न का पूरा सम्मान करब हमार पहिला फर्ज आय और बहस करब हमार अधिकार आय। यहै अधिकार पावै खातिर हमार माय-बाप हमका पढ़ाय रहे हैं। सम्मान क्यार मतलब यू नाही हुवत है कि बड़न केरि गलत बातन पर हाँ मा हॉं मिलावा जाय।
गढ़न-बढ़न सब बहुतै नीक हुवै के कारन, सबसे बहुतै प्यार से बोलै के कारन, छोट-बड़े सबन का नीक नीक पाठ पढ़ावत रहै के कारन, सब का भला- बुरा समझावत रहै के कारन, सबै सुघरी का भी बहुतै प्यार करत हैं। प्यार के साथै-साथ बड़न का सम्मान भी पावत है। बड़न के दिल मा सम्मान भाव का जगावै कै सफलता सुघरी कै असली पूजी आय। आपनि निश्छल बेबाक और तर्कसम्मत बात खुलि कै राखै की खातिर कक्षा 8 मा पढ़ै वाली सुघरी आजु सगरे गाँव मा बिन चुनाव कै अघोषित सरपंच जइसन आदर पावै लागि है। घर-परिवार, मुहल्ला, गाँव, रिश्तेदार सबके मन का सुघरी का चुलबुलापन बहुतै भावत है। सुघरी अपने आप मा कुछ अलगै है। पढ़ै मा सबसे तेज है। नम्बर सबसे ज्यादा पावत है। जतना तेज दिमाग है वतनै तेज जबानौ है। छुटपन से ही सुघरी अजूबा रही है। सबकुछ के बादि सुघरी कै याक आदत कोई का पसन्द नहीं है, ना मेहरुवन का ना मनइन का। आदत यह आय कि सुघरी कछू छिपावत नहीं है, जो वहिका उचित लागत है, जो वहिकी समझ मा आवत है सबके सामनेन बोलै लागत है।
कइयु साल पहिलेक बात आहै, याक दिन चौपाल मा बहुत लोग बैठि रहैं। इहर-उहर से खेलि कै सुघरी आई और पड़ोसी बाबा से बोली कि "बाबा! गुडडू चाचा का मना करि लियौ उइ हमका जबरन पकरि लिहिनि और छः सात चुम्मी लिहिन हैं। कहत रहैं कि कोई से बतायौ ना। सुनि कै सब के कान सन्न होइगे। थोड़ी देर का चुप्पी छाय गै। कुछ देर बाद एक और बाबा बोले कि आवै दियौ सरऊ का कान उचारित है। तुम जाओ ख्यालौ जाय।
याक बार अइसन मास्टर साहब शोर मचावै खातिर कयिउ लरिकन से नाराज भये तौ झटके मा सजा सुनाय दिहिन कि सब लड़िका मुर्गा बनैं और सब बिटेवा एक टांग पर खड़ी होइ जाँय। सुघरी चट्टय बोलि परी कि- "सजा दियै मा भी लिंग भेद..? मास्टर साहब सुनि कै अवाक रहि गए। फौरन तौ सजा मा बदलाव नही किहिन, मुल बादि मा सब मास्टर आपस मा बैठि कै सोचिन-विचारिन और तय किहिन कि आगे से वहै सजा सुनाई जाय जेहिमा भेदभाव की जरूरत न परै।
सुघरी जहाँ रहत है अँधियार भगावा करत है, उजियार फैलावा करत है। सबसे नीक बात आहै कि सुघरी की बात का कोई बुरा नहीं मानत है बल्कि एहसास करत हैं। आस पड़ोस के हमजोली लरिकन केरि बातै दूर, बड़ी उमर वाले भी सुघरी का अंदर से डेरावा करत हैं कि कब और कहाँ केहिकी कौनी बात पर सुघरी का लॉजिक शुरू होइ जाई। मुल सुघरी का ना अपने ज्ञान और लॉजिक का घमण्ड है और ना ही वा बद्तमीज है बल्कि हिसाब से छोटि-बड़े सबका बहुतै लिहाज करत है। बोली भी अतनी प्यारी और कड़कदार है कि वहिकी बातै निश्छल लगती हैं। और है भी निश्छल। सुघरी केर दोस्ती जतनी बिटेवन से है वतनिन लरिकन से है। मुल अतनी साफगोई से रहत है कि का मजाल जो कौनो बदतमीजी करैका सोचि भरि लियै। यहै सब देखि कै हाईस्कूल मा दाखिला के समय सुघरी का नाव दादा जी बदलि कै ज्ञान प्रभा लिखाय दिहिन। यहि नाम से पूरा मुहल्ला सहमत रहै। अतना ज्ञान वाहिका कहाँ से मिलत आहै यू सब के लिए अचंभव है। बकौल सुघरी- अपने घर मा रेडियो सुनत है और बड़की चाची के घरै टीवी देखत है यहै दूनौ वहिके विशेष ज्ञान के श्रोत आहैं।
अब तक अम्मा-बप्पा का कौनौ चिंता नही रहै। ध्यानै नहीं रहा कि गाँव भरेक लाड़ प्यार मा पलै-बढ़ै वाली सुघरी का अब पढ़ै की खातिर शहर जाय का परी। अनपढ़ घर परिवार के लिए या चिंता याक बड़ी समस्या जस सामने आई है। सुघरी का रिजल्ट आवा तौ हाईस्कूल मा जिला टॉप किहिस। यहिसे बड़े-बड़े नेता और अधिकारी घरै आय-आय खूब माला फूल दिहिन और इनाम उपहार भी। पूरी जँवार मा डंका बाजि गवा। यहि से पढ़ाई बन्द करावै का तौ कोई सोचिन नहीं सकत है बल्कि शहर भेजहिन का परी। या चिन्ता केवल घरै घरान केरि ना रहिगै बल्कि सगरै गाँव सोचि विचारि रहा है। जिला टॉप किहे के बादि सुघरी पूरे गाँव केरि इज्जत बनिगै है। गाँव केर नाम रोशन भवा है। अफसर अधिकारिन के आवै के बादि गाँव के बीच वाली रस्ता मा खड़ंजा लागि गवा है। परधान बताइन हैं कि डी एम साहब बिटिया की मेहनत से खुश होइकै यू खड़ंजा लगवाय रहे हैं। और जल्दिन बिजली क्यार छुटकवा 25 वाला हटाए कै बड़ा 100 हॉर्स पवार वाला ट्रांसफार्मर लागि जाई।
सबका लागै लाग है कि या बिटिया याक दिन बहुत बड़ी अफसर बनी और बहुत आगे, बहुत ऊँचे तक जाई, सगरे देश मा उजियार फैलाई।

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