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कुछ अच्छे लोग

लेखक: प्रदीप सारंग • 20 Oct 2026

◆कुछ अच्छे लोग◆

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प्रदीप सारंग

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        आज 18 अक्टूबर 2026 को मेरे साथ घटित एक सुन्दर और लाजवाब घटना के आधार पर कहा जा सकता है कि हर जगह, दुनिया के कोने कोने में कुछ अच्छे लोग होते ही हैं, जो बिखेरते रहते हैं अपनी सुगंध बिना किसी चाह के। चाह होती भी होगी तो शायद यही कि इंसान हैं तो इंसान बने रहेंगे और समय-समय पर अपने को सिद्ध भी करते रहेंगे कि वे इंसान हैं।

       आज 18 अक्टूबर 2026 को आयोज्य अंतरराष्ट्रीय मैगजीन- सक्सेज स्टोरी के लोकार्पण एवं सम्मान समारोह में आमंत्रित होकर कैसरबाग लखनऊ बस स्टेशन से रात 10 बजे की ऐसी बस द्वारा प्रातः मेरठ पहुँचा। ऑटो से शास्त्री नगर पहुँच गए। अब बारी थी पैदल चलने की। हमने सोचा कि कार्यक्रम स्थल पर पहुँचकर वहीं समय बिताएंगे। कई जगह पूछते हुए गंतव्य तक पहुँचा तो आयोजन स्थल स्टूडियो बन्द मिला। फिर पता चला कि आज संडे है तो कार्यक्रम स्थल पर 2 बजे ही इंट्री मिलेगी।स्टूडियो 2 बजे ही खुलेगा। तो हम वापिस होकर पड़ोस स्थित पार्क में समय बिताने का निर्णय लिया। 

        बात सुबह 8 बजे की है जब मैं उत्तर प्रदेश मेरठ के शास्त्री नगर स्थित अंबेडकर पार्क के पास पहुँच कर एक चाय की छोटी सी दुकान पर पार्क में इंट्री हेतु प्रवेश द्वार पूछा कि किधर है। तो एक सज्जन ने पूछा कि क्या आप स्टूडियो खोज नहीं पाए। यह कहते हुए वे उठकर मेरे पास आ गए। तब हमने ध्यान दिया कि कुछ ही देर पहले चौराहे पर आप से हमने रास्ता पूछा था। हमने पूरी बात बताई। तो वे बोले कि चाय पीजिए। हमने मना किया तो पानी पूछ लिया, हमारी स्वीकृति के बाद उन्होंने एक बोतल पानी खरीदा और हमें बोतल पकड़ाने लगे। हमने कहा कि अरे पैसे हम देंगे फिर। तो बोले कि  आप बाहर से आये हैं। चाय पानी तो हमारा फर्ज है। चंद पलों की मुलाकात और फर्ज की बात। वे नहीं माने बोतल हमें पकड़ा ही दी। हमने नाम जानना चाहा तो टाल गए कि नाम में क्या। क्या करते हैं तो बताया कि एक रेडीमेड कपड़ा कम्पनी में प्रेस का कार्य करते हैं। नाम न बताकर, बिना बोले ही उन्होंने एक लम्बे और गहरे दर्शन को प्रस्तुत कर दिया था। समझना न समझना सामने वाले पर निर्भर था। 

हमने धन्यवाद बोला तो भी कहा कि अरे आप बुजुर्ग हैं धन्यवाद अच्छा नहीं लगता। एक और गहरे दर्शन की झलक। मैं निःशब्द, चुपचाप विनम्र-भाव की मुद्रा में सिर्फ हल्का झुकर दोनों हाथ जोड़कर नमन किया और चल पड़े पार्क के इंट्री गेट की ओर।

         इस अंबेडकर पार्क में बिना टिकट इंट्री थी। पार्क टहलते हम सोचने लगे कि क्या सोचकर बंदे ने पानी बोतल खरीद कर दे दी। मेरे कपड़े इस स्तर के थे कि अक्षम समझकर दया भाव से दिया हो ऐसा नहीं था। फिर क्या था? चिंतन का विषय मेरे सामने था। हमने समझा इस बंदे में इंसान होने के सारे गुण मौजूद हैं। शायद उसने इसलिए चाय पानी पूछा कि बाहर शहर से कोई उनके शहर आया है तो पूछना उनका फर्ज है। हमने सोचा कि इस बंदे ने इंसान होने का फर्ज पूरा किया तो अब इंसान बनकर मुझे अपने फर्ज पूरे करने थे। गहरा एहसास था मुझे कि शायद उसने मुझसे यह कह दिया था कि हमारे शहर और पार्क को आप गंदा नहीं करेंगे। हमने पूरा ध्यान रखा कि पूरी यात्रा में हमने बिस्किट खाये, केला खाये, दालमोट के पैकेट भी निपटाए लेकिन हम अपने द्वारा उत्पादित कूड़ा कचरा अपने बैग में रखते रहे और जहाँ कूड़ादान मिला उसके हवाले किया।

      छोटा किन्तु हरियाली से भरपूर है अंबेडकर पार्क। इसी के सामने एक और चिल्ड्रन पार्क है जिसका नाम मान्यवर कांशीराम के नाम पर है। यहाँ इस समय 12:00 बजे तक हाईमास्ट लाइट जल रही है। यह नगर पालिकाओं की लापरवाही का प्रमाणपत्र है। बल्कि विद्युत दुरुपयोग की दास्ताँ भी है। 

       पार्क की बनावट बहुत अच्छी है लेकिन वर्तमान में हालत बहुत खस्ता है। बड़ी बड़ी घास वैसे लगी है जैसे लाचार हो चुके किसी बुजुर्ग के चेहरे पर उगी बेरतीब दाढ़ी। काश इस पार्क का नाम कांशीराम न होकर कुछ और होता? लेकिन फिर याद आया कि- सबदिन जात न एक समान। कभी इनके दिन थे आज उनके दिन हैं। मैं पार्क में बैठा बेंच पर लेटा सोंच रहा हूँ और लिख रहा हूँ कि आज भी ऐसे लोग हैं जिनकी सुगंध से जन जगमग है। आज ऐसे भी लोग हैं जिनकी छुद्र सोंच पार्क की बदहाली की शक्ल में दिख रही है। न इस पार्क में किसी विचारधारा के अनुयायियों की रोक है न उस पार्क में। तो यह उपेक्षित भाव क्यों ? सरकार बदलने के साथ हमारे पार्कों की दशा दुर्दशा में तथा बदहाली साजसज्जा में बदलती रहती है। कभी इस मुहल्ले के लोग पार्क की दुर्दशा को झेलते हैं कभी उस मुहल्ले के लोग। 

        आज मुझे मंत्र कहानी के पात्र भगत और डॉ चड्ढा पुनः दिखाई दे गए। एक तरह अपनी सोंच की सुगंध फैला रहा यह अदना सा अनाम व्यक्ति और उसकी अटपटी चाह तथा अपने नाम की चाह पाले, बारी बारी से राजनीति के पदों पर आसीन होने वाले छुद्र सोंच के वे लोग जिनकी सोंच की परिणति स्वरूप बारी बारी से पार्कों की बदहाली।



        

        

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