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हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

लेखक: Pradeep Sarang • 16 Oct 2026

सदियों की जंजीर को, तोड़ लिया है आज।

पुरुष-प्रेम को जाल कह, विजयी त्रिया समाज।।


नारी को सबने ठगा, समझ गयी जब चाल।

अब नारी ने प्रेम को, समझ लिया जंजाल।।


नथ पहनाई स्वर्ण की, नाथ मानकर नाज।

नथा-नथा डोले फिरे, नथ में पुरूष समाज।।


पुरूष मस्त है प्रेम में, नारी खेले खेल।

तेवर बदले हैं तनिक, पुरुष जा रहे जेल।।


नारी शोषण तंत्र को, तोड़ रही है आज।

नित्य नया गढ़ती दिखे, शोषण मुक्त समाज।।


मनमानी सब छोड़कर, खाये कभी न ताव।

बराबरी स्वीकार ले, तजे बड़प्पन भाव।।


शिक्षा के हथियार से, नारी उन्नति राह।

वैर भाव मन में नहीं, सिर्फ करे आगाह।। 


आगे जाना पुरुष से, ऐसा लक्ष्य न सोंच।

गैर बराबर भाव तज, करे नहीं संकोच।।


नारी मन की चाह है, बराबरी का मान।

व्यर्थ अहं को त्यागकर, पुरुष करे सम्मान।।

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