सुघरी
मेला जाय की खुशी मा, गोबर की खेप लइकै जाय रही 'सुघरी' के कदमन की चाल आजु अपने आपै कुछ बढ़ी हुई है।
गांव का सार्वजनिक सामुदायिक बैठक स्थल जहां लोक चर्चाएं होती हैं।
अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।
गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।
चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।
हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।
अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।
विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।
“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”— प्रदीप सारंग
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गाँव की नन्ही बालिका सुघरी का मेला देखने का सहज उल्लास और ग्रामीण परिवार की आर्थिक जद्दोजहद की मर्मस्पर्शी दास्तान।
अवधी छंदशास्त्र की कुण्डलिया विधा में जन-आंदोलन, पर्यावरण चेतना और सामाजिक विसंगतियों पर सारंग जी की मौलिक सर्जना।
बाराबंकी के ऐतिहासिक वेटलैंड्स, कल्याणी नदी के जल-प्रवाह और सिमटते जलीय पारितंत्र के पुनर्जीवन की जमीनी पड़ताल।
झरिहख और अपने गाँव के बचपन की बारिश की स्मृतियाँ साझा करें
"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"
"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"