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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय १ / ३
अध्याय १
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सुघरी
अवधी गद्य

सुघरी

मेला जाय की खुशी मा, गोबर की खेप लइकै जाय रही 'सुघरी' के कदमन की चाल आजु अपने आपै कुछ बढ़ी हुई है।

account_circle लेखक: प्रदीप सारंग
event 14 Sep 2026
pin_drop ग्राम कमरावां, सतरिख (बाराबंकी)
मेला जाय की खुशी मा, गोबर की खेप लइकै जाय रही 'सुघरी' के कदमन की चाल आजु अपने आपै कुछ बढ़ी हुई है। बीती शाम का खाय के बखत अम्मा जब लरिकन का नाग बाबा मेला देखाय लावै खातिर वकालत किहिन तौ बप्पा वही पुरनके अंदाज मा हामी भरिन और चिकोटी काटत भये टून भी बोलिन कि मन तो तुमरौ होई घूमै का। "मेटकी-प्रसाद" लवहिन का है, तौ तुमहिन चली जाव। मुल, काने नकुना और गटई मा जौन सोना चाँदी चमके हौ, उतारि कै जायो। पिछली बार मेंला मा जंजीरै, नथुनी, बाला, झाला आदि खूब नोचे गए रर्है। कइउ छिनइया मेहरुआ-मर्द, रँगे-हाथ पकरे गे रहैं। लाउडस्पीकर से पुलिस बतावत भी रहै कि सोना चाँदी के जेवर पहिर कै मेला ना आवैक चाही। अगर कोई पहिर कै आवत है तौ खुदै जिम्मेदारी उठावै और अपने जेवरन का विशेष ध्यान राखै। सुघरी का अपने सिर पर रखी गोबर कै खेप आजु वाकई हल्की लागि रही है। मन मा लड्डू फूटि रहे हैं कि आजु सर्कश देखैक मिली और हिंडोलना झूलैक भी। जलेबी सोचि कै तौ मुहिमा पानिन आय गवा। पिछली बार जलेबी खाय के चक्कर मा देर होइगै रहै, जलेबी खातै मा अचानक पानी बरसै लाग जेहिसे चारिउ तरफ पानी भरिगा रहै। अतना पानी बरसा अतना पानी बरसा कि सब मजा किरकिरा होइगा रहै। मेला की सड़कन पर टिहुनिन तक पानी बहत रहै। का सर्कश, का हिंडोलना, सब बन्द। भिजतै घर आवै का परा रहै। मेला क्यार मजा तौ किरकिरा भवा, मुल भीजत आवै मा, खलभल-खलभल चलै मा, एक दुसरे पर छपाक लगावै का, जौन मजा आवा रहै ऊ कौनौ कम नही रहै। सबसे ज्यादा मजा तौ तब आवा जब सबका हिदायत दियत चलै वाली बड़की चाची बिछुलि कै गिरि परीं। सबै दौर परे उठावै खातिर। और लरिकेहरी भरि ताली बजाय के जौन हँसिस है कि मानौ इनाम मिलिगा हुयै। दादा खुदौ आपनि हँसी रोकि ना पाइन मुल चाची कै नाराजगी से बचै की खातिर लरिकन का फटकारै लागि रहैं। आजौ तक जब ई सब यादि आवत है तौ मनु मुस्काय लागत है। अबकी बार मेला के रस्ते मा नवा बना हाईस्कूल देखै का लालच भी सुघरी के दिमाग मा जरूर है काहेकि अगले साल कक्षा-9 यही स्कूल मा पढ़ै का है। पहिलेन साल गाँव की आधा दर्जन बिटेवा यही स्कूल मा दाखिला लिहिन हैं, और अच्छी पढ़ाई का बखान करि रही हैं। बखान सुनि सुनि कै लरिकन बिटेवन का मन बना है कि यही स्कूल मा पढ़ैक है। सुघरी का जइसन नाम है वइसन सुन्दर रूप है और वइसन सुन्दर बोली बानी भी। ई धरती पर अपनी तरह कै या अकेलि बिटेवा है। यहि के दिल दिमाग मा पता नहीं कइसन याक बात बैठिगै है कि लड़की-लड़िका मा कछु भेद नहीं है। सिर्फ बनावट मा अन्तर है। अन्दर से सब एकै तरह के हैं। सुघरी बहस करत है कि "दुई अदमी हैं एक गोर एक काला, एक दिव्यांग एक स्वस्थ। तौ का रंगभेद के कारन या विकलांगता के कारन दूनउ के दुख-दर्द के एहसास मा कौनउ अन्तर आई..? सपना, सोच विचार आचरन आदि मा कौनौ अन्तर का रंग भेद के कारन या विकलांगता के कारन आई...? ई दूनउ सवालन का जवाब है- नहीं।" विकलांगता यानी शरीर की बनावट के कारन सिर्फ चलै-फिरै, उठै-बइठै मा अन्तर आय सकत है ना कि सोच, विचार, सपना, और एहसास मा। यहै भूल सगरे समाज से होइ रही है। अब सुघरी केर तिसरा सवाल आहै कि "जइसन शरीर के बनावट से भी कछु विशेष अन्तर नही हुअत है वइसन लिंग भेद के कारन भी कौनउ अन्तर नाही हुवत है। और जौन अन्तर देखात हैं उइ लिंग भेद के कारण नहीं बल्कि विशेष संकुचित सोच के कारण हुअत हैं। अदमी की सोच है कि ऊ बिना ताज के राजा आहै। मेहरुवन केरि सोच है कि उइ राजन के आदेश का पालन करै वाली दासी और रानी आहैं।" सुघरी कहत है कि "हम और सब मेहरुवन बिटेवन की तरह नहीं हन। हमका कोउ हाँकै तब हम चलब, यू कबौ न होई। हमका जौन नीक लागी वहै करब। मुल गलत कुछ न करब, न गलत कुछ सुनब। समझ मा ना आई, तौ बहस जरूर करब। बड़न का पूरा सम्मान करब हमार पहिला फर्ज आय और बहस करब हमार अधिकार आय। यहै अधिकार पावै खातिर हमार माय-बाप हमका पढ़ाय रहे हैं। सम्मान क्यार मतलब यू नाही हुवत है कि बड़न केरि गलत बातन पर हाँ मा हॉं मिलावा जाय। गढ़न-बढ़न सब बहुतै नीक हुवै के कारन, सबसे बहुतै प्यार से बोलै के कारन, छोट-बड़े सबन का नीक नीक पाठ पढ़ावत रहै के कारन, सब का भला- बुरा समझावत रहै के कारन, सबै सुघरी का भी बहुतै प्यार करत हैं। प्यार के साथै-साथ बड़न का सम्मान भी पावत है। बड़न के दिल मा सम्मान भाव का जगावै कै सफलता सुघरी कै असली पूजी आय। आपनि निश्छल बेबाक और तर्कसम्मत बात खुलि कै राखै की खातिर कक्षा 8 मा पढ़ै वाली सुघरी आजु सगरे गाँव मा बिन चुनाव कै अघोषित सरपंच जइसन आदर पावै लागि है। घर-परिवार, मुहल्ला, गाँव, रिश्तेदार सबके मन का सुघरी का चुलबुलापन बहुतै भावत है। सुघरी अपने आप मा कुछ अलगै है। पढ़ै मा सबसे तेज है। नम्बर सबसे ज्यादा पावत है। जतना तेज दिमाग है वतनै तेज जबानौ है। छुटपन से ही सुघरी अजूबा रही है। सबकुछ के बादि सुघरी कै याक आदत कोई का पसन्द नहीं है, ना मेहरुवन का ना मनइन का। आदत यह आय कि सुघरी कछू छिपावत नहीं है, जो वहिका उचित लागत है, जो वहिकी समझ मा आवत है सबके सामनेन बोलै लागत है। कइयु साल पहिलेक बात आहै, याक दिन चौपाल मा बहुत लोग बैठि रहैं। इहर-उहर से खेलि कै सुघरी आई और पड़ोसी बाबा से बोली कि "बाबा! गुडडू चाचा का मना करि लियौ उइ हमका जबरन पकरि लिहिनि और छः सात चुम्मी लिहिन हैं। कहत रहैं कि कोई से बतायौ ना। सुनि कै सब के कान सन्न होइगे। थोड़ी देर का चुप्पी छाय गै। कुछ देर बाद एक और बाबा बोले कि आवै दियौ सरऊ का कान उचारित है। तुम जाओ ख्यालौ जाय। याक बार अइसन मास्टर साहब शोर मचावै खातिर कयिउ लरिकन से नाराज भये तौ झटके मा सजा सुनाय दिहिन कि सब लड़िका मुर्गा बनैं और सब बिटेवा एक टांग पर खड़ी होइ जाँय। सुघरी चट्टय बोलि परी कि- "सजा दियै मा भी लिंग भेद..? मास्टर साहब सुनि कै अवाक रहि गए। फौरन तौ सजा मा बदलाव नही किहिन, मुल बादि मा सब मास्टर आपस मा बैठि कै सोचिन-विचारिन और तय किहिन कि आगे से वहै सजा सुनाई जाय जेहिमा भेदभाव की जरूरत न परै। सुघरी जहाँ रहत है अँधियार भगावा करत है, उजियार फैलावा करत है। सबसे नीक बात आहै कि सुघरी की बात का कोई बुरा नहीं मानत है बल्कि एहसास करत हैं। आस पड़ोस के हमजोली लरिकन केरि बातै दूर, बड़ी उमर वाले भी सुघरी का अंदर से डेरावा करत हैं कि कब और कहाँ केहिकी कौनी बात पर सुघरी का लॉजिक शुरू होइ जाई। मुल सुघरी का ना अपने ज्ञान और लॉजिक का घमण्ड है और ना ही वा बद्तमीज है बल्कि हिसाब से छोटि-बड़े सबका बहुतै लिहाज करत है। बोली भी अतनी प्यारी और कड़कदार है कि वहिकी बातै निश्छल लगती हैं। और है भी निश्छल। सुघरी केर दोस्ती जतनी बिटेवन से है वतनिन लरिकन से है। मुल अतनी साफगोई से रहत है कि का मजाल जो कौनो बदतमीजी करैका सोचि भरि लियै। यहै सब देखि कै हाईस्कूल मा दाखिला के समय सुघरी का नाव दादा जी बदलि कै ज्ञान प्रभा लिखाय दिहिन। यहि नाम से पूरा मुहल्ला सहमत रहै। अतना ज्ञान वाहिका कहाँ से मिलत आहै यू सब के लिए अचंभव है। बकौल सुघरी- अपने घर मा रेडियो सुनत है और बड़की चाची के घरै टीवी देखत है यहै दूनौ वहिके विशेष ज्ञान के श्रोत आहैं। अब तक अम्मा-बप्पा का कौनौ चिंता नही रहै। ध्यानै नहीं रहा कि गाँव भरेक लाड़ प्यार मा पलै-बढ़ै वाली सुघरी का अब पढ़ै की खातिर शहर जाय का परी। अनपढ़ घर परिवार के लिए या चिंता याक बड़ी समस्या जस सामने आई है। सुघरी का रिजल्ट आवा तौ हाईस्कूल मा जिला टॉप किहिस। यहिसे बड़े-बड़े नेता और अधिकारी घरै आय-आय खूब माला फूल दिहिन और इनाम उपहार भी। पूरी जँवार मा डंका बाजि गवा। यहि से पढ़ाई बन्द करावै का तौ कोई सोचिन नहीं सकत है बल्कि शहर भेजहिन का परी। या चिन्ता केवल घरै घरान केरि ना रहिगै बल्कि सगरै गाँव सोचि विचारि रहा है। जिला टॉप किहे के बादि सुघरी पूरे गाँव केरि इज्जत बनिगै है। गाँव केर नाम रोशन भवा है। अफसर अधिकारिन के आवै के बादि गाँव के बीच वाली रस्ता मा खड़ंजा लागि गवा है। परधान बताइन हैं कि डी एम साहब बिटिया की मेहनत से खुश होइकै यू खड़ंजा लगवाय रहे हैं। और जल्दिन बिजली क्यार छुटकवा 25 वाला हटाए कै बड़ा 100 हॉर्स पवार वाला ट्रांसफार्मर लागि जाई। सबका लागै लाग है कि या बिटिया याक दिन बहुत बड़ी अफसर बनी और बहुत आगे, बहुत ऊँचे तक जाई, सगरे देश मा उजियार फैलाई।
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*पादटिप्पणी संदर्भ: झरिहख (अवधी संज्ञा) — बिना रुके अनवरत चलने वाली धीमी रिमझिम व मूसलाधार फुहार, जो दिन-रात आकाश को घेरे रखती है।

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— श्री प्रदीप सारंग

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण सम्पूर्ण
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
चौपाल संज्ञा • Awadhi

गांव का सार्वजनिक सामुदायिक बैठक स्थल जहां लोक चर्चाएं होती हैं।

झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

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प्रदीप सारंग
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प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on कमरावां, सतरिख, बाराबंकी (उ० प्र०)
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

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“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— प्रदीप सारंग
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पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

झरिहख और अपने गाँव के बचपन की बारिश की स्मृतियाँ साझा करें

२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
verified

"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026
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"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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