चार दशकों की साधना: पारदर्शी और सजीव सामुदायिक प्रभाव
बाराबंकी और अवध अंचल के गांवों, चौपालों और विद्यालयों में 50,000+ पौधरोपण, 10,000+ परिंदा जल-सकोरा सेवा और जन-जागरूकता का प्रामाणिक आंकड़ेवार लेखा-जोखा।
क्षेत्रवार सजीव बदलाव एवं दीर्घकालिक प्रभाव
1. पर्यावरण संवर्धन व 'ग्रीन गैंग' आंदोलन
5 जून 2019 से स्थापित 'ग्रीन गैंग' के माध्यम से जनपद बाराबंकी के 150 से अधिक गांवों में 50,000 बरगद, पीपल, नीम और पाकड़ के वृक्षों का रोपण किया गया। अभिवादन में 'ग्रीन मॉर्निंग' का संस्कार अब विद्यालयों व चौपालों की जीवनशैली बन चुका है।
2. परिंदा व वन्यजीव संरक्षण अभियान
ग्रीष्म ऋतु में पक्षियों के जीवन की रक्षा हेतु 10,000 से अधिक मिट्टी के सकोरे व दाना पात्र वितरित किए गए। 2016 में उत्तर प्रदेश शासन के वन मंत्री द्वारा 'वन्य जीव संरक्षण विशिष्ट प्रशस्ति पत्र' से अलंकृत।
3. अवधी भाषा, साहित्य व लोक-सांस्कृतिक चेतना
अवधी भाषा के संरक्षण हेतु संस्मरण संकलन 'झरिहख', 151 छन्दबद्ध कुंडलियों का ग्रन्थ 'सारंग-कुंडलियाँ' तथा प्रतिवर्ष 16 से 31 अगस्त तक आयोजित 'तुलसी जयंती पखवारा'। जनकवि बंशीधर शुक्ल व तुलसी सम्मान से अलंकृत।
4. लोक स्वास्थ्य, रक्तदान व कोरोना योद्धा सेवा
सैकड़ों रक्तदान शिविरों का आयोजन व रेडक्रॉस सोसाइटी सम्मान। 2020 की वैश्विक महामारी में अग्रिम मोर्चे पर रहकर ग्रामीण असहायों को भोजन, दवा, मास्क वितरण एवं आपातकालीन राहत।
ग्राम कमरावाँ एवं बाराबंकी में आए सजीव बदलाव का तुलनात्मक ब्योरा
- close ग्रामीण पगडंडियों और सड़कों के किनारे छायादार वृक्षों का अभाव।
- close गर्मी के दिनों में पक्षियों के लिए पीने का पानी न होने से भारी मृत्यु-दर।
- close अवधी लोक-साहित्य और ग्रामीण कहावतों का लुप्तप्राय होना।
- check_circle 50,000+ सुरक्षित बरगद, पीपल व नीम वृक्षों से लहलहाते हरित गलियारे।
- check_circle 10,000+ सकोरे स्थापित; 5,000+ पंजीकृत 'परिंदा मित्र' रोज पानी भरते हैं।
- check_circle अवधी ग्रन्थ 'झरिहख' व 151 कुण्डलियाँ प्रकाशित; विद्यालयों में 'ग्रीन मॉर्निंग' का संस्कार।
ग्रामीणों, शिक्षकों एवं स्वयंसेवक युवाओं के विचार
"सारंग जी के ग्रीन गैंग अभियान से हमारे गाँव की सड़क के दोनों ओर अब घने बरगद और नीम की छाया है। बच्चे सुबह विद्यालय में 'गुड मॉर्निंग' की जगह 'ग्रीन मॉर्निंग' बोलते हैं। यह एक नया संस्कार है।"
"गर्मी के दिनों में जब हम लोग छतों पर सकोरे में पानी भरते हैं, तो दर्जनों गौरैया और बुलबुल पानी पीने आती हैं। सारंग जी ने हमें बेज़ुबान पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनाया है।"
"अवधी साहित्य में सारंग जी की 'सारंग-कुंडलियाँ' और 'झरिहख' ग्रन्थ हमारी लोक-सांस्कृतिक पहचान को अमर बना रहे हैं। उनकी रचनाशीलता युवा पीढ़ी के लिए अनुपम प्रेरणा है।"
इस सामुदायिक प्रभाव को और आगे बढ़ाएं
चाहे आप पौधा गोद लेना चाहें, सकोरा बैंक स्पॉन्सर करना चाहें या स्वयंसेवक बनना चाहें — आपका हर प्रयास समाज को समृद्ध बनाता है।