मैं फेल हुआ या पास....?
मैं फेल हुआ या पास ...?
पढ़कर आप सभी बताओ।
◆◆द्वंद बनाम कर्तव्य◆◆
( एक सत्य घटना का अक्षरशः वर्णन)
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प्रदीप सारंग
9919007190
मेरे जैसे लोग भी जब द्वंद का सामना करते हैं तो हम मानते हैं कि हम एक बड़ी परीक्षा से गुजरते हैं। आज की परीक्षा में पास हुए या फेल। मिलेंगे कितने प्रतिशत अंक? ये निर्णय करेंगे इस आलेख के पाठकगण प्रतिक्रिया में बताएं जरूर कि मुझे क्या करना चाहिए था? मैं इस परीक्षा में पास रहा या फेल?
घटना है 22 सितम्बर 2026 की जब हम नेपाल गंज नेपाल में वरिष्ठ साहित्यकार श्री सनत रेग्मी जी के 80वें जन्म दिन पर महेन्द्र पुस्तकालय में आयोजित पुस्तक विमोचन एवं जन्मोत्सव समारोह में शामिल होकर रुपईडीहा से एसी बस जनरथ 5976 में सवार हुए। बस शाम 6 बजे के लगभग चली। डेढ़ घंटे बाद नानपारा के बाद बस में दो सवारी चढ़ीं। एक युवक, एक युवती। युवक नीली जीन्स और सफेद शर्ट यानी सामान्य कपड़ों में था और युवती काले बुरखे में थी, मुँह भी बँधा हुआ था।
कुछ देर बाद जब परिचालक ने टिकट लेने की बात की तब इन लोगों ने नगद पैसे न होने की बात की। उसने पूछा कि जाना कहाँ है तो युवती बोली- झाँसी। इस बात पर मेरा ध्यान इनकी तरफ गया। हम बस में दाहिनी तरफ दूसरी थ्री सीटर सीट पर हम बैठे थे। ये दोनों मेरे आगे यानी पहली थ्री सीटर सीट पर बैठे थे।
इन दोनों की बातचीत का लहजा बता रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है। परिचालक ने कहा कि नगद नहीं हैं तो क्या क्यू आर से भेजोगे.? इस क्यूआर को वे समझ नहीं पाए। तो परिचालक ने फिर पूछा कि क्या किसी से पैसा मँगवाना या भिजवाना है। क्यूआर दिखाते हुए बोला कि ये फोटो खींच लो। शायद युवती चाहती थी कि साथी युवक मोबाइल से पेमेंट करे। लेकिन युवक ने कुछ कहा तो युवती ने परिचालक से पूछा कि क्या हम 500 भेज दें तो आप शेष वापिस करेंगे। इसपर परिचालक ने इंकार किया नहीं जितने का टिकट है उतना ही भेजो। परिचालक ने लखनऊ अवध बस स्टेशन तक ही बस जाएगी ऐसा बोला और किराया बताया और टिकट हो गया।
जब ये सब हो गया तो परिचालक ने युवक से नाम पूछा। युवक कुछ बोले उससे पहले युवती बोल पड़ी कि नाम से क्या होगा? एक तरह से नाम पूछने पर युवती ने आपत्ति प्रकट की।
परिचालक और मेरे सामने अब माजरा साफ था कि दोनों घर वालों से छिपकर दोनों भाग निकले थे। साफ यह भी था कि युवक ने युवती को नहीं बल्कि युवती ने युवक को भगाया हुआ है। हमारी और परिचालक दोनों की नजर इनकी गतिविधियों पर थी। कुछ देर बाद युवती ने उठकर सामने ऊपर की तरफ लगे चार्जर पॉइंट में चार्जर लगाने लगी तो उसका एक हाथ कोहनी तक दिख गया। जिससे साफ हो गया कि युवती की उम्र युवक से कुछ अधिक ही थी। सम्भव है कि युवती विवाहित ही हो।
परिचालक भी मुश्लिम था। उसके दिल दिमाग में सामाजिक होने का भाव जागा। मुझे लगता है काफी सोचने के बाद उसने पुनः इस युगल से कहा कि हम लोग रोज तरह-तरह की सवारी देखते हैं। सब समझ में आ रहा है। तुम लोग घर छोड़ कर आये हो। इस पर दोनों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। परिचालक के अंदर का सामाजिक भाव कुछ और प्रबल हुआ फिर बोला कि गलत कर रहे हो। अभी समझ सोच लो विचार करो। जिंदगी नरक बन जाती है। मेरा काम समझाना है। बाकी तुम लोग जो मन हो करो। उसने अपना नाम बताया ताकि युगल को लगे कि वह भी मुस्लिम है। और शायद वह समझा भी इसीलिए रहा हो कि मुस्लिम युगल को दिग्भ्रमित देखकर कुछ ज्यादा ही सामाजिकता जग गयी हो। परिचालक ने एक बार और कहा लेकिन युगल पूरी तरह अनसुनी कर रहा था। इसप्रकार के निर्णय लेकर कदम बढ़ाने वाले लोगों पर एक दो बातों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन सीमाओं में रहते हुए सामाजिक होने का कर्तव्य परिचालक ने पूरा किया।
सामाजिक होने, पत्रकार होने का ऐसा एक द्वंद मेरे अंदर भी पनप चुका था कि आखिरकार इस प्रकरण में मेरी भूमिका क्या हो सकती है..?? यानी मुझे क्या करना चाहिए? कुछ करना चाहिए अथवा नजरअंदाज करना चाहिए? बस में बैठे अन्य यात्रियों की भाँति अपने काम में मस्त रहना चाहिए? आदि प्रश्न दिमाग में कुलबुलाने लगे।
संकट था कि अगर युवती या युवक से कोई बात की जाए तो अपरिचित की दशा में वे गलत प्रतिक्रिया दे सकते थे तब अपमानित होने का एहसास होता। इससे बचना ही था। दूसरे यह कि उसकी भागने की योजना में व्यवधान आता देख, बौखलाहट में कोई आरोप भी लगा सकती थी। इससे भी बचना ही था। फिर भी एक बेचैनी मेरे दिल दिमाग में उत्पन्न हो चुकी थी कि यह दोनों कर तो गलत ही रहे हैं। कल थाने में पहले गुमसुदगी और फिर एफआईआर होगी। युवती के माँ बाप परिजन परेशान होंगे। बेइज्जती महसूस करेंगे सो अलग। बस में बैठे यात्री क्या सोंच रहे थे मुझे नहीं पता किन्तु मैं यही सब सोंचता रहा।
मन में आया कि परिचालक से मोबाइल नम्बर लूँ, जिससे युवती ने किराया पेमेंट किया है। फिर मन में आया कि परिचालक को नम्बर देना भी नहीं चाहिए। यह किसी की प्राइवेसी भंग करने जैसा होगा। वैसे परिचालक की ईमानदारी पर मन प्रसन्न हो रहा था कि यदि वह सिर्फ परिचालक की भूमिका निभाता तो उसे कोई बात करने की जरूरत नहीं थी। किन्तु वह शायद बेटे बेटियों का बाप भी होगा। एक मनुष्य तो है ही। इसी नाते उसने बड़ी ईमानदारी से फर्ज निभाकर अपने मन को सन्तुष्ट कर लिया। रह गए हम जिसे भी जिम्मेदार नागरिक, जागरूक पत्रकार, संवेदनशील कवि, मार्गदर्शक सलाहकार के रूप कुछ करना चाहिए था।
युवक और युवती के मध्य, बीच-बीच प्रेम परक लपझप जिन्हें हम एडवांस युग की स्वस्थ गतिविधियाँ कह सकते हैं प्रचलित रहीं। अन्य यात्री ये सब नहीं देख पा रहे थे किंतु मैं जस्ट पीछे वाली सीट पर था अतः मुझे अनायास बिना प्रयास कुछ स्वस्थ झलकियाँ दिख ही जाती रहीं। इसी दौरान युवक के मोबाइल पर घंटी बजी। मैंने सोंचा कि ऐसे में तो लोग फोन स्विचऑफ कर लिया करते हैं। किन्तु ये अभी नवजात चूजा है जो दुनियावी चंट चालाकियाँ सीखने से पहले ही प्रेम के गहरे समंदर में फिसल गया है। मुझे तो यही लगता है कि प्रेम के गहराई में मगन, सयानी ने इस कम तैराक को खींच लिया है और अब दोनों एकरस हैं। या तो किसी एक कि नादानी से दोनों डूब जाएंगे या संभव है कि एक की कुशलता से दोनों पार हो जाएं।
खैर, उसने फोन रिसीव किया। उसने कहा कि बाइक अंडे वाले की दुकान के पीछे खड़ी है। चाभी दुकानदार के पास है। बता दो कि मैं उस्मान हूँ तो चाभी दे देगा। शायद जब उधर से जवाब आया कि चाभी मिल गयी है तब इधर से कहा गया कि किसी को कुछ मत बताना। यह कहते हुए फोन काल काट दिया। मुझे एक बार फिर लगा कि युवक में भलाई-सिधाई मरी नहीं है बल्कि हार्मोन्स के उलझाव में भटक गया है। मेरे मन में यह भी आया कि इसी भलाई सिधाई के कारण युवती ने पेंग बढ़ाई होगी। यह अलग बात है कि वह भी अपने परिवेश और परिजनों से असंतुष्ट रही होगी। इस मामले में युवती और परिजन दोनों बराबर के दोषी ठहरते हैं। परिजन को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि किशोर मन कोई भी अभिव्यक्ति बोल सकें। और किशोर मन को भी घर में किसी एक से अपने मन की बातें मन के उमड़ते भाव जरूर बताने चाहिए। तभी नहीं बताते हैं जब माहौल में नासमझी और अविश्वास की उपस्थिति हो।
शाम 7:30 बज गया। न्यूज का समय था। न्यूज में व्यस्त रहा। फिर अखबार के पेज बनकर आने लगे। मैं संपादन करता रहा और सोंचता भी रहा कि क्या किया जा सकता है? सोंचा कि यह बस अवध बस स्टेशन जाएगी। वहीं के इंस्पेक्टर को बोलूँ कि एक संदिग्ध युगल बस में सवार है। महिला दरोगा आकर कुछ पूछताछ कर ले। शायद एक एफआईआर दर्ज होने की स्थिति से पहले ही मामला खुल जाए। फिर सोंचा कि ऐसा हो तो जाएगा लेकिन सूचना देने वाले का नाम लिखा जरूर जाएगा। यह जिम्मेदारी मेरे से ज्यादा परिचालक की बनती है कि यदि कुछ ऐसा वैसा है तो वह सूचित करे। जो उसने नहीं किया। परिचालक सूचित करता अगर शांति भंग हो रही होती अथवा राष्ट्र विरोधी कुछ संदिग्ध गतिविधि का अनुमान लगता तब। उसे ऐसा लगा नहीं तो हम क्यों अधिक जिम्मेदार बनने की कोशिश करें। लेकिन मन में कुछ न कुछ करने चिंतन चलता रहा।
रूटीन वे में बस रामनगर के आसपास भोजन के लिए ढाबा पर रुकी। सभी उतरे, हम भी उतरे। मेरी नजर इन्ही दोनों पर बनी रही। कुछ खाने के लिए इन्हें पर्दा हटाना पड़ेगा। मन में आया कि वीडियो बना लें। लेकिन वीडियो बनाना आपत्तिजनक था। इसलिए वीडियो बनाने में भी सतर्कता बरतनी थी। कुल मिलाकर जो मैं करना चाह रहा था वह नहीं कर सका। कुछ वीडियो बनाये भी। किन्तु सवाल था कि भेजें किसे। मैं अपनी गोपनीयता भंग नहीं होने देना चाहते थे। पुलिस को भेजते तो उनसे गोपनीयता की अपेक्षा नहीं थी। पुलिस मुझे प्रथम सूचना प्रदाता मानकर, और क्लू जानने के निमित्त पूछताछ करने आ सकती थी, बुला भी सकती थी। ऐसा सोंचकर वीडियो किसी को नहीं भेजे। आलेख लिख कर अपने कर्तब्य की पूर्णता मान ली।
अब पाठक गण की बारी है कि बतायें और अपनी प्रतिक्रिया ब्यक्त करें। यह भी लिखें कि एक जागरूक नागरिक, सजग पत्रकार, संवेदनशील कवि, मार्गदर्शक-सलाहकार के रूप में मुझे क्या करना चाहिए था और कितना कर पाया? मैं इस परीक्षा में पास रहा या फेल?