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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय ६ / १४
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आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

सामाजिक होने, पत्रकार होने का ऐसा एक द्वंद मेरे अंदर भी पनप चुका था कि आखिरकार इस प्रकरण में मेरी भूमिका क्या हो सकती है..?? यानी मुझे क्या करना चाहिए?  कुछ करना चाहिए अथवा नजरअंदाज करना चाहिए? बस में बैठे अन्य यात्रियों की भाँति अपने काम में मस्त रहना चाहिए? आदि प्रश्न दिमाग में कुलबुलाने लगे। 

account_circle लेखक: Pradeep Sarang
event 16 Oct 2026
pin_drop कमरावां, बाराबंकी (उ.प्र.)
schedule 12 min read
spa

मैं फेल हुआ या पास ...? 

पढ़कर आप सभी बताओ। 

◆◆द्वंद बनाम कर्तव्य◆◆ 

( एक सत्य घटना का अक्षरशः वर्णन)

====================

प्रदीप सारंग

9919007190


      मेरे जैसे लोग भी जब द्वंद का सामना करते हैं तो हम मानते हैं कि हम एक बड़ी परीक्षा से गुजरते हैं। आज की परीक्षा में पास हुए या फेल। मिलेंगे कितने प्रतिशत अंक? ये निर्णय करेंगे इस आलेख के पाठकगण प्रतिक्रिया में बताएं जरूर कि मुझे क्या करना चाहिए था?  मैं इस परीक्षा में पास रहा या फेल?

       घटना है 22 सितम्बर 2026 की जब हम नेपाल गंज नेपाल में वरिष्ठ साहित्यकार श्री सनत रेग्मी जी के 80वें जन्म दिन पर महेन्द्र पुस्तकालय में आयोजित पुस्तक विमोचन एवं जन्मोत्सव समारोह में शामिल होकर रुपईडीहा से एसी बस जनरथ 5976 में सवार हुए। बस शाम 6 बजे के लगभग चली। डेढ़ घंटे बाद नानपारा के बाद बस में दो सवारी चढ़ीं। एक युवक, एक युवती। युवक नीली जीन्स और सफेद शर्ट यानी सामान्य कपड़ों में था और युवती काले बुरखे में थी, मुँह भी बँधा हुआ था।

कुछ देर बाद जब परिचालक ने टिकट लेने की बात की तब इन लोगों ने नगद पैसे न होने की बात की। उसने पूछा कि जाना कहाँ है तो युवती बोली- झाँसी। इस बात पर मेरा ध्यान इनकी तरफ गया। हम बस में दाहिनी तरफ दूसरी थ्री सीटर सीट पर हम बैठे थे। ये दोनों मेरे आगे यानी पहली थ्री सीटर सीट पर बैठे थे।

       इन दोनों की बातचीत का लहजा बता रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है। परिचालक ने कहा कि नगद नहीं हैं तो क्या क्यू आर से भेजोगे.? इस क्यूआर को वे समझ नहीं पाए। तो परिचालक ने फिर पूछा कि क्या किसी से पैसा मँगवाना या भिजवाना है। क्यूआर दिखाते हुए बोला कि ये फोटो खींच लो। शायद युवती चाहती थी कि साथी युवक मोबाइल से पेमेंट करे। लेकिन युवक ने कुछ कहा तो युवती ने परिचालक से पूछा कि क्या हम 500 भेज दें तो आप शेष वापिस करेंगे। इसपर परिचालक ने इंकार किया नहीं जितने का टिकट है उतना ही भेजो। परिचालक ने लखनऊ अवध बस स्टेशन तक ही बस जाएगी ऐसा बोला और किराया बताया और टिकट हो गया।

         जब ये सब हो गया तो परिचालक ने युवक से नाम पूछा। युवक कुछ बोले उससे पहले युवती बोल पड़ी कि नाम से क्या होगा? एक तरह से नाम पूछने पर युवती ने आपत्ति प्रकट की।

        परिचालक और मेरे सामने अब माजरा साफ था कि दोनों घर वालों से छिपकर दोनों भाग निकले थे। साफ यह भी था कि युवक ने युवती को नहीं बल्कि युवती ने युवक को भगाया हुआ है। हमारी और परिचालक दोनों की नजर इनकी गतिविधियों पर थी। कुछ देर बाद युवती ने उठकर सामने ऊपर की तरफ लगे चार्जर पॉइंट में चार्जर लगाने लगी तो उसका एक हाथ कोहनी तक दिख गया। जिससे साफ हो गया कि युवती की उम्र युवक से कुछ अधिक ही थी। सम्भव है कि युवती विवाहित ही हो।

          परिचालक भी मुश्लिम था। उसके दिल दिमाग में सामाजिक होने का भाव जागा। मुझे लगता है काफी सोचने के बाद उसने पुनः इस युगल से कहा कि हम लोग रोज तरह-तरह की सवारी देखते हैं। सब समझ में आ रहा है। तुम लोग घर छोड़ कर आये हो। इस पर दोनों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। परिचालक के अंदर का सामाजिक भाव कुछ और प्रबल हुआ फिर बोला कि गलत कर रहे हो। अभी समझ सोच लो विचार करो। जिंदगी नरक बन जाती है। मेरा काम समझाना है। बाकी तुम लोग जो मन हो करो। उसने अपना नाम बताया ताकि युगल को लगे कि वह भी मुस्लिम है। और शायद वह समझा भी इसीलिए रहा हो कि मुस्लिम युगल को दिग्भ्रमित देखकर कुछ ज्यादा ही सामाजिकता जग गयी हो। परिचालक ने एक बार और कहा  लेकिन युगल पूरी तरह अनसुनी कर रहा था। इसप्रकार के निर्णय लेकर कदम बढ़ाने वाले लोगों पर एक दो बातों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन सीमाओं में रहते हुए सामाजिक होने का कर्तव्य परिचालक ने पूरा किया।

           सामाजिक होने, पत्रकार होने का ऐसा एक द्वंद मेरे अंदर भी पनप चुका था कि आखिरकार इस प्रकरण में मेरी भूमिका क्या हो सकती है..?? यानी मुझे क्या करना चाहिए?  कुछ करना चाहिए अथवा नजरअंदाज करना चाहिए? बस में बैठे अन्य यात्रियों की भाँति अपने काम में मस्त रहना चाहिए? आदि प्रश्न दिमाग में कुलबुलाने लगे। 

             संकट था कि अगर युवती या युवक से कोई बात की जाए तो अपरिचित की दशा में वे गलत प्रतिक्रिया दे सकते थे तब अपमानित होने का एहसास होता। इससे बचना ही था। दूसरे यह कि उसकी भागने की योजना में व्यवधान आता देख, बौखलाहट में कोई आरोप भी लगा सकती थी। इससे भी बचना ही था। फिर भी एक बेचैनी मेरे दिल दिमाग में उत्पन्न हो चुकी थी कि यह दोनों कर तो गलत ही रहे हैं। कल थाने में पहले गुमसुदगी और फिर एफआईआर होगी। युवती के माँ बाप परिजन परेशान होंगे। बेइज्जती महसूस करेंगे सो अलग। बस में बैठे यात्री क्या सोंच रहे थे मुझे नहीं पता किन्तु मैं यही सब सोंचता रहा। 

       मन में आया कि परिचालक से मोबाइल नम्बर लूँ, जिससे युवती ने किराया पेमेंट किया है। फिर मन में आया कि परिचालक को नम्बर देना भी नहीं चाहिए। यह किसी की प्राइवेसी भंग करने जैसा होगा। वैसे परिचालक की ईमानदारी पर मन प्रसन्न हो रहा था कि यदि वह सिर्फ परिचालक की भूमिका निभाता तो उसे कोई बात करने की जरूरत नहीं थी। किन्तु वह शायद बेटे बेटियों का बाप भी होगा। एक मनुष्य तो है ही। इसी नाते उसने बड़ी ईमानदारी से फर्ज निभाकर अपने मन को सन्तुष्ट कर लिया। रह गए हम जिसे भी जिम्मेदार नागरिक, जागरूक पत्रकार, संवेदनशील कवि, मार्गदर्शक  सलाहकार के रूप कुछ करना चाहिए था। 

         युवक और युवती के मध्य, बीच-बीच प्रेम परक लपझप जिन्हें हम एडवांस युग की स्वस्थ गतिविधियाँ कह सकते हैं प्रचलित रहीं। अन्य यात्री ये सब नहीं देख पा रहे थे किंतु मैं जस्ट पीछे वाली सीट पर था अतः मुझे अनायास बिना प्रयास कुछ स्वस्थ झलकियाँ दिख ही जाती रहीं। इसी दौरान युवक के मोबाइल पर घंटी बजी। मैंने सोंचा कि ऐसे में तो लोग फोन स्विचऑफ कर लिया करते हैं। किन्तु ये अभी नवजात चूजा है जो दुनियावी चंट चालाकियाँ सीखने से पहले ही प्रेम के गहरे समंदर में फिसल गया है। मुझे तो यही लगता है कि प्रेम के गहराई में मगन, सयानी ने इस कम तैराक को खींच लिया है और अब दोनों एकरस हैं। या तो किसी एक कि नादानी से दोनों डूब जाएंगे या संभव है कि एक की कुशलता से दोनों पार हो जाएं।

        खैर, उसने फोन रिसीव किया। उसने कहा कि बाइक अंडे वाले की दुकान के पीछे खड़ी है। चाभी दुकानदार के पास है। बता दो कि मैं उस्मान हूँ तो चाभी दे देगा। शायद जब उधर से जवाब आया कि चाभी मिल गयी है तब इधर से कहा गया कि किसी को कुछ मत बताना। यह कहते हुए फोन काल काट दिया। मुझे एक बार फिर लगा कि युवक में भलाई-सिधाई मरी नहीं है बल्कि हार्मोन्स के उलझाव में भटक गया है। मेरे मन में यह भी आया कि इसी भलाई सिधाई के कारण युवती ने पेंग बढ़ाई होगी। यह अलग बात है कि वह भी अपने परिवेश और परिजनों से असंतुष्ट रही होगी। इस मामले में युवती और परिजन दोनों बराबर के दोषी ठहरते हैं। परिजन को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि किशोर मन कोई भी अभिव्यक्ति बोल सकें। और किशोर मन को भी घर में किसी एक से अपने मन की बातें मन के उमड़ते भाव जरूर बताने चाहिए। तभी नहीं बताते हैं जब माहौल में नासमझी और अविश्वास की उपस्थिति हो।

         शाम 7:30 बज गया। न्यूज का समय था। न्यूज में व्यस्त रहा। फिर अखबार के पेज बनकर आने लगे। मैं संपादन करता रहा और सोंचता भी रहा कि क्या किया जा सकता है? सोंचा कि यह बस अवध बस स्टेशन जाएगी। वहीं के इंस्पेक्टर को बोलूँ कि एक संदिग्ध युगल बस में सवार है। महिला दरोगा आकर कुछ पूछताछ कर ले। शायद एक एफआईआर दर्ज होने की स्थिति से पहले ही मामला खुल जाए। फिर सोंचा कि ऐसा हो तो जाएगा लेकिन सूचना देने वाले का नाम लिखा जरूर जाएगा। यह जिम्मेदारी मेरे से ज्यादा परिचालक की बनती है कि यदि कुछ ऐसा वैसा है तो वह सूचित करे। जो उसने नहीं किया। परिचालक सूचित करता अगर शांति भंग हो रही होती अथवा राष्ट्र विरोधी कुछ संदिग्ध गतिविधि का अनुमान लगता तब। उसे ऐसा लगा नहीं तो हम क्यों अधिक जिम्मेदार बनने की कोशिश करें। लेकिन मन में कुछ न कुछ करने चिंतन चलता रहा।

          रूटीन वे में बस रामनगर के आसपास भोजन के लिए ढाबा पर रुकी। सभी उतरे, हम भी उतरे। मेरी नजर इन्ही दोनों पर बनी रही। कुछ खाने के लिए इन्हें पर्दा हटाना पड़ेगा। मन में आया कि वीडियो बना लें। लेकिन वीडियो बनाना आपत्तिजनक था। इसलिए वीडियो बनाने में भी सतर्कता बरतनी थी। कुल मिलाकर जो मैं करना चाह रहा था वह नहीं कर सका। कुछ वीडियो बनाये भी। किन्तु सवाल था कि भेजें किसे। मैं अपनी गोपनीयता भंग नहीं होने देना चाहते थे। पुलिस को भेजते तो उनसे गोपनीयता की अपेक्षा नहीं थी। पुलिस मुझे प्रथम सूचना प्रदाता मानकर, और क्लू जानने के निमित्त पूछताछ करने आ सकती थी, बुला भी सकती थी। ऐसा सोंचकर वीडियो किसी को नहीं भेजे। आलेख लिख कर अपने कर्तब्य की पूर्णता मान ली।

      अब पाठक गण की बारी है कि बतायें और अपनी प्रतिक्रिया ब्यक्त करें। यह भी लिखें कि एक जागरूक नागरिक, सजग पत्रकार, संवेदनशील कवि, मार्गदर्शक-सलाहकार के रूप में मुझे क्या करना चाहिए था और कितना कर पाया? मैं इस परीक्षा में पास रहा या फेल?

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— Pradeep Sarang

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण संकलन
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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ग्रंथ अनुक्रमणिका

कुल १४ आलेख व अध्याय
१
आलेख

कुछ अच्छे लोग

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२
अवधी गद्य

अवधी किहानी, सुघरी -2

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३
अवधी गद्य

झरिहख

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४
हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

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५
आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

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६
आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

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७
आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

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८
आलेख

छात्रों में उच्च मानवीय मूल्य और रेडक्रास

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९
आलेख

एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता

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१०
आलेख

नृत्य द्वारा उठाया जाता है - देवी-देवताओं के वाहन से जुड़े रहस्य से पर्दा

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११
आलेख

कैसे बनें पत्रकार, जानें कुछ जरूरी बातें

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१२
आलेख

भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार

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१३
आलेख

स्त्री बनाम पुरूष

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१४
अवधी गद्य

सुघरी

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प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

ओसारा संज्ञा • Awadhi

मकान के सामने बना बरामदा या छज्जे के नीचे की बैठक जहाँ चौपाल लगती है।

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श्री प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on ग्राम कमरावां, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— श्री प्रदीप सारंग
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लेखक विचार अस्वीकरण (Editorial & Author Disclaimer)

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार, अनुभव और विश्लेषण पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। वेबसाइट एवं संपादकीय मंडल आलेख में व्यक्त निजी दृष्टिकोण की स्वतंत्रता का सम्मान करता है। विस्तृत कानूनी शर्तों व नीतियों के लिए कृपया हमारी अस्वीकरण नीति (Disclaimer) एवं संपादकीय नीति (Editorial Policy) देखें।

साहित्य संचयन

स्वीकृत अवधी कृतियाँ व अन्य आलेख

सभी स्वीकृत आलेख देखें arrow_forward
कुछ अच्छे लोग आलेख
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कुछ अच्छे लोग

संस्मरण मेरठ यात्रा

अवधी किहानी, सुघरी -2 अवधी गद्य
20 Oct 2026 • 8 min read

अवधी किहानी, सुघरी -2

अवधी किहानी - सुघरी 2

झरिहख अवधी गद्य
18 Oct 2026 • 8 min read

झरिहख

आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही।

पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

मैं फेल हुआ या पास....? एवं अवधी साहित्य पर अपने विचार साझा करें

२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
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"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026

"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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