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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय ७ / १४
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आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

विभाग में कई बड़े अधिकारी इस रिश्वत काण्ड में संलिप्त थे। यह मुझे थोड़ा विलम्ब से पता चला था। तब से अर्थात् नवम्बर 2017 यानी सेवा निवृत्ति से इस विभाग को उच्च भिक्षा विभाग ही लिखता, पढ़ता और कहता हूॅं। अधिकारियों को भी उच्च भिक्षा अधिकारी, उच्च भिक्षा निदेशक, सहायक उच्च भिक्षा निदेशक, भिक्षा निदेशक, संयुक्त भिक्षा निदेशक आदि-आदि।

account_circle लेखक: Pradeep Sarang
event 16 Oct 2026
pin_drop कमरावां, बाराबंकी (उ.प्र.)
schedule 12 min read
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विचलन बनाम छतिपूर्ति

==============

प्रदीप सारंग

9919007190

    

            राजकीय महाविद्यालय के सेवा निवृत्त प्राचार्य डॉ सुधाकर तिवारी जी से दूरभाष के माध्यम से   प्रायः चर्चा परिचर्चा होती रहती है। डॉ सुधाकर तिवारी भोजपुरी के विद्वान हैं। आदर्शों और मूल्यों का उनके जीवन में प्रथम वरेण्य स्थान है। वैसे तो वे स्वभाव से बहुत सरल  हैं किंतु कुछ मामलों में जिद्दी यानी कठोर हो जाते हैं। यह कठोरता लोगों को उनके व्यक्तित्व की कमी लगती है किंतु मुझे उनकी यह कठोरता उनके तनकर खड़े रहने वाले व्यक्तित्व की रीढ़ दिखती है। उनकी यही विशेषता न सिर्फ हमें लुभाती है बल्कि निकटता का एहसास कराती है। उनसे मुलाकातें कम दूरभाष पर बातें ज्यादा होती हैं। प्रसंगवश एक दिन उन्होंने डॉ कुमार के संस्मरण सुनाए। जो बहुत महत्वपूर्ण लगे।  डॉ तिवारी से बातचीत के आधार पर प्रस्तुत है  वर्णन-

      प्रोफेसर कुमार आये दिन उच्च शिक्षा विभाग को उच्च भिच्छा विभाग कहकर तंज कसते रहते थे। लोग प्रोफेसर कुमार का बहुत आदर करते थे अतः सभी सुनकर हल्की मुस्कान के साथ टाल दिया करते थे। लेकिन यह अनुमान सबको था कि भिच्छा विभाग कहना किसी बड़ी पीड़ा का प्रतिफलन है। सेवा निवृत्ति के सात साल बाद भी प्रोफेसर कुमार के सामने लोग इस तरह प्रस्तुत होते थे कि जैसे वे आज भी पदासीन हों। 

एक दिन हमने पूछ ही दिया कि जिस विभाग में जीवन बीता उसी को उच्च भिच्छा कहने के पीछे का दर्शन क्या है ? हम भी अपनी तरह के अकेले जीव ही रहे थे इस विभाग में। प्राचार्य होने के बाद मुझे भी न तो राजकीय महाविद्यालय हजम कर पा रहा था और न हम विभाग की कारगुजारियाँ। किन्तु हम दोनों ही एक दूसरे को 60 साल पूरे कर चुके पति पत्नी की तरह तलाक सोंच भी नहीं सकते थे और रोज की खटपट से बच भी नहीं सकते थे। सिर्फ झेलना रहता है। 

       प्रोफेसर कुमार ने एक प्रश्न के उत्तर में दो संस्मरण सुनाए- 

      प्रोफेसर कुमार उत्तर प्रदेश के एक राजकीय महाविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे। प्रथम नियुक्ति में नए-नए आए थे, इसलिए सीने में उसूलों की धड़कन अभी तेज थी। उन्हें लगता था कि शिक्षक का काम केवल तनख्वाह उठाना नहीं, बल्कि उस कक्षा में बैठकर देश की नई पीढ़ी की रीढ़ मजबूत करना है। समस्या बस एक थी-कक्षा में कुर्सियाँ अक्सर खाली मिलती थीं। शहर के कोचिंग संस्थानों के चमकीले विज्ञापनों और प्रतियोगी परीक्षाओं के भारी दबाव ने डिग्री कॉलेजों को केवल परीक्षा केंद्र बनाकर छोड़ दिया था। साठ नामांकित विद्यार्थियों में से बमुश्किल आठ या दस ही कभी-कभार नजर आते। 

        प्रोफेसर कुमार रोज पूरी तैयारी के साथ जाते, श्यामपट्ट पर चॉक से लिखते, उन दस छात्रों को भी पूरी शिद्दत से पढ़ाते, और अंत में हाजिरी रजिस्टर खोलकर केवल उन्हीं के नाम के आगे दर्ज करते जो वास्तव में सामने बैठे थे।

       एक दिन अचानक प्रोफेसर कुमार को प्राचार्य साहब ने तुरंत अपने कक्ष में बुलवाया, रजिस्टर भी साथ ले जाने को कहा। प्रोफेसर कुमार को लगा शायद पाठ्यक्रम या किसी नए सेमिनार पर चर्चा होगी। वे आत्मविश्वास के साथ प्राचार्य कक्ष में दाखिल हुए। प्राचार्य जी अपनी घूमती हुई कुर्सी पर टिके थे। मेज पर चारों प्राध्यापकों के उपस्थिति रजिस्टर खुले पड़े थे। प्राचार्य जी के माथे पर गहरी शिकन थी। उन्होंने चश्मा नाक पर टिकाते हुए प्रोफेसर कुमार को देखा और बिना किसी भूमिका के बोले- "प्रोफेसर कुमार जी, कॉलेज में चार विभाग हैं। देखिए, बाकी तीनों विभागों के रजिस्टरों में छात्रों की उपस्थिति निन्यानवे से सौ प्रतिशत के बीच है। और आपके रजिस्टर में? केवल पंद्रह प्रतिशत ! यह क्या मजाक है?

सर, मैं तो बस वही लिखता हूँ जो सच है, प्रोफेसर कुमार ने शालीनता से अपना पक्ष रखा। क्लास में लड़के आते ही नहीं। सब कोचिंग सेंटरों में व्यस्त रहते हैं।

       प्राचार्य जी का चेहरा सख्त हो गया। उन्होंने अपनी आवाज को थोडा भारी करते हुए कहा- लड़के क्यों नहीं आते प्रोफेसर कुमार?

 इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि या तो आप पढ़ाते अच्छा नहीं हैं, या फिर आपको अपने विषय का ज्ञान नहीं है?

देखिए, बाकी तीनों शिक्षक कितने लोकप्रिय है। उनकी कक्षाएं पूरी भरी रहती है। अगर छात्र आपकी कक्षा का बहिष्कार कर रहे हैं, तो कमी तंत्र में नहीं, आपमें है।"

प्रोफेसर कुमार अवाक रह गए। लेकिन सर, वास्तविकता तो यह है कि-....

मुझे वास्तविकता की थ्योरी मत पढ़ाइए, प्राचार्य जी ने बात बीच में ही काट दी। 

फाइलें ऊपर जाती हैं। उच्च शिक्षा निदेशालय से कभी भी ऑडिट टीम आ सकती है। आपके पंद्रह प्रतिशत की वजह से पूरा कॉलेज कटघरे में खड़ा होगा। 

अगर आप अपनी कक्षाएं नहीं चला पा रहे, तो मुझे आपकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में लिखना पड़ेगा कि आप अध्यापन कार्य में अक्षम हैं। फिर सेवा पुस्तिका पर लाल स्याही लगेगी, प्रमोशन रुकेगा और दूरदराज के किसी इलाके में तबादला भी हो सकता है। अब आप खुद सोच लीजिए।

कमरे में सन्नाटा छा गया। एयर कंडीशनर की की हल्की घुरघुराहट के बीच प्रोफेसर कुमार को लगा जैसे उनकी बरसों की पढ़ाई, उनका स्वाभिमान और उनकी ईमानदारी किसी गहरी खाई में गिर रहे हों। वे उस सच के बोझ तले दब रहे थे जिसे कोई देखना ही नहीं चाहता था। 

      उन्हें घर में बैठी अपनी बीमार माँ, छोटे बच्चों की स्कूल फीस और उस दूरदराज के कस्बे का खौफनाक ख्याल आया जहाँ तबादले की धमकी दी गई थी। प्रोफेसर कुमार ने गहरी सांस ली। उनका गला सूख चुका था।

     सर... मुझे पाँच मिनट दीजिए। मैं अभी आता हूँ। प्रोफेसर कुमार ने धीमी, टूटी हुई आवाज में कहा। और वे रजिस्टर उठाकर बाहर आए। स्टाफ रूम का कोना खाली था। प्रोफेसर कुमार ने अपनी जेब से वही नीली स्याही वाला पेन निकाला जिससे वे ईमानदारी की लकीरें खींचा करते थे। हाथ काँप रहे थे, लेकिन कलम तेजी से चलने लगी। पन्ने दर पन्ने, खाली खानों में एक लय के साथ अंकित होता चला गया। 

जो छात्र महीनों से शक्ल तक नहीं दिखाए थे, वे भी कागजों पर उस कक्षा में जिंदा हो गए।

दस मिनट बाद प्रोफेसर कुमार दोबारा प्राचार्य कक्ष में थे। उन्होंने रजिस्टर मेज पर रख दिया।

प्राचार्य जी ने रजिस्टर के पन्ने पलटे। हर नाम के आगे नीली स्याही से दर्ज उपस्थिति सौ प्रतिशत चमक रही थी। 

     प्राचार्य जी के चेहरे का तनाव गायब हो गया। एक संतुष्ट मुस्कान उनके होठों पर तैर गई। उन्होंने तुरंत एक सफेद कागज निकाला, अपनी कीमती फाउंटेन पेन से प्रोफेसर कुमार की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट लिखी- अत्यंत कर्मठ, विषय के निष्णात और छात्रों में बेहद लोकप्रिय प्राध्यापक। उत्कृष्ट कार्यप्रदर्शन।

     हस्ताक्षर करके प्राचार्य जी ने फाइल बंद की और मुस्कुराते हुए प्रोफेसर कुमार की पीठ थपथपाई, यह हुई न बात! इसे कहते हैं संस्था के प्रति निष्ठा। अब जाइए, समाजशास्त्र की अगली कक्षा का समय हो गया है।

     प्रोफेसर कुमार शून्य में ताकते हुए बाहर निकल आए। कॉरिडोर की दीवार पर महात्मा गाँधी का एक सुविचार लिखा टँगा था- सत्य ही ईश्वर है। मेरी नजर पड़ी और मन में एक सदवाक्य उभरा- सत्यमेव बायोमेट्रिक जयते। परेशान प्रोफेसर कुमार अपने कक्ष में आये और धम्म से कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने सोचा कि मेरी ईमानदारी इतनी है कि मैं क्लास जाऊँगा। क्लास में छात्र कितने बैठे हैं इससे बिना प्रभावित हुए पूर्ववत पढ़ाऊँगा और साथ ही बकौल प्राचार्य जिस इंस्टीट्यूट में काम करता हूँ उसकी छवि भी बचाऊँगा। हम भी खुश रहेंगे और इंस्टीट्यूट भी।

         प्रोफेसर कुमार ने एक लंबी साँस ली फिर कहने लगे- जिस प्रकार कार का इंजन, सेल्फ अथवा गैस फँसने के कारण एक आध बार झटके लेता है फिर दौड़ पड़ता है। उसी तरह इस झटके के बाद पुनः जिंदगी दौड़ पड़ी। समय बीतता गया। मेरा भी प्रमोशन हुआ। अब मैं भी प्राचार्य बना। प्राचार्य परम्परा को निर्विघ्न संचालित करता रहा। इस कुर्सी का अनुभव यानी उच्च शिक्षा निदेशालय में एक बाबू द्वारा माँगे गये एवं लिए गए रिश्वत का प्रकरण ही तुम्हारे द्वारा पूछे गए यक्ष प्रश्न का उत्तर है- 

      रिश्वत की घटना 1991 की है। मैं 2017 में सेवा निवृत्त हो गया। सेवा निवृत्ति तक 26 वर्षों में निदेशालय को दो ईमानदार अधिकारी नहीं मिल सके जॉंच करने के लिए। इस प्रकरण में बीसियों बार जॉंच अधिकारी बदले गये ।

मैं रिटायर हो गया। दोनों बाबू भी रिटायर हो गये। पर रिश्वत के उस प्रकरण की जॉंच नहीं हो सकी।

कारण ? विभाग में कई बड़े अधिकारी इस रिश्वत काण्ड में संलिप्त थे। यह मुझे थोड़ा विलम्ब से पता चला था। तब से अर्थात् नवम्बर 2017 यानी सेवा निवृत्ति से इस विभाग को उच्च भिक्षा विभाग ही लिखता, पढ़ता और कहता हूॅं। अधिकारियों को भी उच्च भिक्षा अधिकारी, उच्च भिक्षा निदेशक, सहायक उच्च भिक्षा निदेशक, भिक्षा निदेशक, संयुक्त भिक्षा निदेशक आदि-आदि।

 मैंने कहा कि डर नहीं लगता इतना खरा बोलने पर? बेबाकी से जवाब मिला कि- हम तो चली चला की बेला में हूँ। डरें वे जो गलत करते हैं। हम तो मजबूरी में कर्तव्य विचलन की छतिपूर्ति में ऐसा बोलता हूँ। सच बताऊँ तिवारी जी! जब मैं उच्च भिक्षा बोलता हूँ तो मुझे अपने कर्तव्य विचलन की न सिर्फ छतिपूर्ति लगती है बल्कि जिस डर में हमने इंस्टीट्यूट की छवि बचाता रहा था, पुनः निडर होने का एहसास आत्म संतुष्टि प्राप्त होती है। अब न डर है न मजबूरी। तब कर्तव्यनिष्ठ होकर सच को सच कहना, मेरा प्रायश्चित भी तो है। 

मैंने उठकर प्रोफेसर कुमार के अत्यंत श्रद्धा के साथ चरण स्पर्श किए और कहा कि आप धन्य हैं गुरुदेव। वे सिर्फ मुस्कराए। प्रोफेसर कुमार की मुस्कान में हमें वाकई निर्द्वंदता निडरता के दर्शन हुए। थोड़ा और गहरे झाँकने पर छतिपूर्ति के भाव भी झलकने लगे।

पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि हो न हो यह डॉ तिवारी के जीवन की ही सच घटना हो। उन्हीं के अनुभव हों जिसे उन्होंने प्रोफेसर कुमार के नाम से परोस दी है। लेखक प्रायः आप बीती दूसरों के नाम से लिखता ही रहता है। सच क्या है जानें डॉ तिवारी जी, हमको जो लगा हमने लिखा। सवाल यह महत्वपूर्ण है ही नहीं कि उक्त घटनाएं किसके साथ घटी हैं, बड़ा सवाल यह है कि जंगे-आजादी में अंग्रेजों की बर्बरताएं झेलकर सर्वस्व बलिदान कर देने वाले हमारे पुरखों ने भारत को आजादी के बाद किधर ले जाना चाहते थे और यह देश किधर जा रहा है।

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— Pradeep Sarang

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण संकलन
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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ग्रंथ अनुक्रमणिका

कुल १४ आलेख व अध्याय
१
आलेख

कुछ अच्छे लोग

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२
अवधी गद्य

अवधी किहानी, सुघरी -2

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३
अवधी गद्य

झरिहख

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४
हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

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५
आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

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६
आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

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७
आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

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८
आलेख

छात्रों में उच्च मानवीय मूल्य और रेडक्रास

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९
आलेख

एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता

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१०
आलेख

नृत्य द्वारा उठाया जाता है - देवी-देवताओं के वाहन से जुड़े रहस्य से पर्दा

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११
आलेख

कैसे बनें पत्रकार, जानें कुछ जरूरी बातें

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१२
आलेख

भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार

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१३
आलेख

स्त्री बनाम पुरूष

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१४
अवधी गद्य

सुघरी

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प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

ओसारा संज्ञा • Awadhi

मकान के सामने बना बरामदा या छज्जे के नीचे की बैठक जहाँ चौपाल लगती है।

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श्री प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on ग्राम कमरावां, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— श्री प्रदीप सारंग
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लेखक विचार अस्वीकरण (Editorial & Author Disclaimer)

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार, अनुभव और विश्लेषण पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। वेबसाइट एवं संपादकीय मंडल आलेख में व्यक्त निजी दृष्टिकोण की स्वतंत्रता का सम्मान करता है। विस्तृत कानूनी शर्तों व नीतियों के लिए कृपया हमारी अस्वीकरण नीति (Disclaimer) एवं संपादकीय नीति (Editorial Policy) देखें।

साहित्य संचयन

स्वीकृत अवधी कृतियाँ व अन्य आलेख

सभी स्वीकृत आलेख देखें arrow_forward
कुछ अच्छे लोग आलेख
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कुछ अच्छे लोग

संस्मरण मेरठ यात्रा

अवधी किहानी, सुघरी -2 अवधी गद्य
20 Oct 2026 • 8 min read

अवधी किहानी, सुघरी -2

अवधी किहानी - सुघरी 2

झरिहख अवधी गद्य
18 Oct 2026 • 8 min read

झरिहख

आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही।

पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

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२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
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"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026

"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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