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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय ५ / १४
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आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि पारंपरिक "जजमानी" के नाम पर जबरन पैसे लेना कानूनी रूप से मान्य नहीं है।         जबरन वसूली अपराध है। कोर्ट ने कहा कि यदि नेग मांगने में दबाव, धमकी या जबरन वसूली शामिल है, तो यह भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध की श्रेणी में आएगा और इसके लिए एफआईआर  दर्ज की जा सकती है।

account_circle लेखक: प्रदीप सारंग
event 16 Oct 2026
pin_drop कमरावां, बाराबंकी (उ.प्र.)
schedule 12 min read
spa
नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट
photo_camera आलेख प्रमुख दृश्य • प्रदीप सारंग संग्रह उच्च-रिज़ॉल्यूशन मूल छायाचित्र

 भारत में लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि इसमें रहने वाला कोई श्रेष्ठ अथवा कोई अश्रेष्ठ नहीं होता। सभी की स्वतंत्रता, सभी का मान सम्मान, सभी के लिए अवसर की उपलब्धता सुनिश्चित करना कराना संविधान की प्राथमिकता होती है। अपनी किसी विशेष मान्यता अथवा मनमानी के चलते कोई किसी की निजता, स्वतंत्रता, समानता, सम्मान बाधित नहीं कर सकता। यानी लोकतंत्र, किन्हीं परम्पराओं-मान्यताओं, किसी की मनमानी से नहीं बल्कि संविधान से संचालित होता है।

         लोकतंत्र के बावजूद, लोग मनमानी करने पर आमादा रहते हैं। जब किसी के दिल दिमाग में शक्तिशाली होने का एहसास पनपता है तो वह स्वयमेव मनमानी की तरफ बढ़ जाता है। यानी इस एहसास का पनप जाना ही लोकतंत्र के मूल्यों का मरना है। कुछ लोग जाति के एहसास पर, कुछ धर्म के एहसास पर, कुछ परम्पराओं के एहसास पर कुछ धनवान होने के एहसास पर और कुछ लोग ज्ञानवान होने के एहसास पर अपने दिल दिमाग में अनेक मनमानियों को पनपने देते हैं। परिणामस्वरूप उनके निर्णय और व्यवहार में बदलाव आ जाता है जो कि प्रायः संविधान विरोधी हो जाता है। ये निर्णय, ये व्यवहार संविधान की ऊर्जा से नहीं बल्कि जाति, धर्म, परम्परा, मान्यताओं उपलब्धियों की ऊर्जा व अहम से निर्मित होने लगते हैं।

       ऐसे लोगों की संख्या भारत में कम नहीं है, और न कम होने दी जा रही है। जाति धर्म परम्परा मान्यता उपलब्धि इत्यादि की आड़ में विशेष अधिकार विशेष सुविधाओं का आनंद उठा रहे लोग, समाज में अपने जैसे अहमधारी लोग, अपने विचारों जैसे लोगों की संख्या बढ़ाने हेतु प्रयास जारी रखे जाते हैं। कम समझदार लोग तो कुछ समझदार किन्तु निजी स्वार्थ में लिप्त लोग यह संख्या बढ़ाते रहते हैं।

        ऐसी अलोकतांत्रिक मनमानियां ऐसे व्यवहार, न सिर्फ मानवता के लिए कलंक की तरह होती हैं बल्कि कुछ अंशों में संविधान का राज समाप्त करने वाली होती हैं। जब कभी कोई ऐसी अलोकतांत्रिक मनमानियों से ऊबकर अथवा मनमानी करने में बाधाओं के विरुद्ध अदालत के दरवाजे तक पहुँचता है तो न्यायालय के लिए संविधान का राज स्थापित करने का एक सुंदर अवसर होता है। ऐसा ही एक मामला जिला गोंडा से उठा जो कि अदालत तक पहुँचा और अदालत का निर्णय एक नजीर बन गया।

        इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले महीने अप्रैल 2026 में जबरन नेग माँगने यानी बधाई देने हेतु पैसा माँगने के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किन्नर समुदाय को नेग माँगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, और जबरन नेग माँगना या वसूली करना एक आपराधिक कृत्य है।

       यह फैसला रेखा देवी नामक किन्नर की याचिका पर आया है। किन्नर रेखा देवी द्वारा हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके गोंडा जिले में नेग वसूली के लिए विशिष्ट क्षेत्र आरक्षित करने की माँग की गई थी। उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने सारी दलीलें सुनने के बाद किन्नर रेखा देवी की याचिका कोर्ट ने खारिज कर दिया और कहा कि किसी के द्वारा नेग माँगना कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि पारंपरिक "जजमानी" के नाम पर जबरन पैसे लेना कानूनी रूप से मान्य नहीं है। जबरन वसूली अपराध है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई किन्नर तय राशि या मनमाने पैसे की माँग करता है और माँगा गया धन न देने पर अभद्रता या हिंसा करता है, तो इसे अवैध वसूली माना जाएगा। यानी नेग माँगने में दबाव, धमकी या जबरन वसूली शामिल है, तो यह भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध की श्रेणी में आएगा और इसके लिए एफआईआर दर्ज की जा सकती है।

        स्वेच्छा से ही दिया गया नेग उचित है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि खुशी या स्वेच्छा से दिया गया नेग स्वीकार्य है, लेकिन किसी को डराकर या जबरदस्ती पैसे लेना गैरकानूनी है।

        हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद, यदि किन्नर या कोई अन्य व्यक्ति नेग के नाम पर जबरन वसूली या बदसलूकी करता है, तो पीड़ित के पास कानूनी रास्ता एफआईआर का रास्ता उपलब्ध है। यह निर्णय किन्नर समुदाय के परंपरागत अधिकारों की आड़ में होने वाली जबरन वसूली पर रोक लगाता है। अभी तक ऐसे मामलों में पुलिस भी एफआईआर से बचती रही थी क्योंकि कोई स्पस्ट मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं था किन्तु उच्च न्यायालय की द्वय-खंडपीठ द्वारा पारित आदेश ने पुलिस और आम जन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अब आवश्यकता है जन जागरूकता की। निर्णय का आना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है जानकारी का प्रसार। 

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— प्रदीप सारंग

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण संकलन
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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ग्रंथ अनुक्रमणिका

कुल १४ आलेख व अध्याय
१
आलेख

कुछ अच्छे लोग

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२
अवधी गद्य

अवधी किहानी, सुघरी -2

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३
अवधी गद्य

झरिहख

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४
हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

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५
आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

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६
आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

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७
आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

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८
आलेख

छात्रों में उच्च मानवीय मूल्य और रेडक्रास

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९
आलेख

एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता

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१०
आलेख

नृत्य द्वारा उठाया जाता है - देवी-देवताओं के वाहन से जुड़े रहस्य से पर्दा

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११
आलेख

कैसे बनें पत्रकार, जानें कुछ जरूरी बातें

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१२
आलेख

भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार

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१३
आलेख

स्त्री बनाम पुरूष

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१४
अवधी गद्य

सुघरी

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प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

ओसारा संज्ञा • Awadhi

मकान के सामने बना बरामदा या छज्जे के नीचे की बैठक जहाँ चौपाल लगती है।

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श्री प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on ग्राम कमरावां, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— श्री प्रदीप सारंग
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साहित्य संचयन

स्वीकृत अवधी कृतियाँ व अन्य आलेख

सभी स्वीकृत आलेख देखें arrow_forward
कुछ अच्छे लोग आलेख
20 Oct 2026 • 8 min read

कुछ अच्छे लोग

संस्मरण मेरठ यात्रा

अवधी किहानी, सुघरी -2 अवधी गद्य
20 Oct 2026 • 8 min read

अवधी किहानी, सुघरी -2

अवधी किहानी - सुघरी 2

झरिहख अवधी गद्य
18 Oct 2026 • 8 min read

झरिहख

आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही।

पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट एवं अवधी साहित्य पर अपने विचार साझा करें

२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
verified

"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026

"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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