नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट
<p>न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि पारंपरिक "जजमानी" के नाम पर जबरन पैसे लेना कानूनी रूप से मान्य नहीं है।</p><p> जबरन वसूली अपराध है। कोर्ट ने कहा कि यदि नेग मांगने में दबाव, धमकी या जबरन वसूली शामिल है, तो यह भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध की श्रेणी में आएगा और इसके लिए एफआईआर दर्ज की जा सकती है।</p>
भारत में लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि इसमें रहने वाला कोई श्रेष्ठ अथवा कोई अश्रेष्ठ नहीं होता। सभी की स्वतंत्रता, सभी का मान सम्मान, सभी के लिए अवसर की उपलब्धता सुनिश्चित करना कराना संविधान की प्राथमिकता होती है। अपनी किसी विशेष मान्यता अथवा मनमानी के चलते कोई किसी की निजता, स्वतंत्रता, समानता, सम्मान बाधित नहीं कर सकता। यानी लोकतंत्र, किन्हीं परम्पराओं-मान्यताओं, किसी की मनमानी से नहीं बल्कि संविधान से संचालित होता है।
लोकतंत्र के बावजूद, लोग मनमानी करने पर आमादा रहते हैं। जब किसी के दिल दिमाग में शक्तिशाली होने का एहसास पनपता है तो वह स्वयमेव मनमानी की तरफ बढ़ जाता है। यानी इस एहसास का पनप जाना ही लोकतंत्र के मूल्यों का मरना है। कुछ लोग जाति के एहसास पर, कुछ धर्म के एहसास पर, कुछ परम्पराओं के एहसास पर कुछ धनवान होने के एहसास पर और कुछ लोग ज्ञानवान होने के एहसास पर अपने दिल दिमाग में अनेक मनमानियों को पनपने देते हैं। परिणामस्वरूप उनके निर्णय और व्यवहार में बदलाव आ जाता है जो कि प्रायः संविधान विरोधी हो जाता है। ये निर्णय, ये व्यवहार संविधान की ऊर्जा से नहीं बल्कि जाति, धर्म, परम्परा, मान्यताओं उपलब्धियों की ऊर्जा व अहम से निर्मित होने लगते हैं।
ऐसे लोगों की संख्या भारत में कम नहीं है, और न कम होने दी जा रही है। जाति धर्म परम्परा मान्यता उपलब्धि इत्यादि की आड़ में विशेष अधिकार विशेष सुविधाओं का आनंद उठा रहे लोग, समाज में अपने जैसे अहमधारी लोग, अपने विचारों जैसे लोगों की संख्या बढ़ाने हेतु प्रयास जारी रखे जाते हैं। कम समझदार लोग तो कुछ समझदार किन्तु निजी स्वार्थ में लिप्त लोग यह संख्या बढ़ाते रहते हैं।
ऐसी अलोकतांत्रिक मनमानियां ऐसे व्यवहार, न सिर्फ मानवता के लिए कलंक की तरह होती हैं बल्कि कुछ अंशों में संविधान का राज समाप्त करने वाली होती हैं। जब कभी कोई ऐसी अलोकतांत्रिक मनमानियों से ऊबकर अथवा मनमानी करने में बाधाओं के विरुद्ध अदालत के दरवाजे तक पहुँचता है तो न्यायालय के लिए संविधान का राज स्थापित करने का एक सुंदर अवसर होता है। ऐसा ही एक मामला जिला गोंडा से उठा जो कि अदालत तक पहुँचा और अदालत का निर्णय एक नजीर बन गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले महीने अप्रैल 2026 में जबरन नेग माँगने यानी बधाई देने हेतु पैसा माँगने के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किन्नर समुदाय को नेग माँगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, और जबरन नेग माँगना या वसूली करना एक आपराधिक कृत्य है।
यह फैसला रेखा देवी नामक किन्नर की याचिका पर आया है। किन्नर रेखा देवी द्वारा हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके गोंडा जिले में नेग वसूली के लिए विशिष्ट क्षेत्र आरक्षित करने की माँग की गई थी। उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने सारी दलीलें सुनने के बाद किन्नर रेखा देवी की याचिका कोर्ट ने खारिज कर दिया और कहा कि किसी के द्वारा नेग माँगना कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि पारंपरिक "जजमानी" के नाम पर जबरन पैसे लेना कानूनी रूप से मान्य नहीं है। जबरन वसूली अपराध है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई किन्नर तय राशि या मनमाने पैसे की माँग करता है और माँगा गया धन न देने पर अभद्रता या हिंसा करता है, तो इसे अवैध वसूली माना जाएगा। यानी नेग माँगने में दबाव, धमकी या जबरन वसूली शामिल है, तो यह भारतीय न्याय संहिता के तहत अपराध की श्रेणी में आएगा और इसके लिए एफआईआर दर्ज की जा सकती है।
स्वेच्छा से ही दिया गया नेग उचित है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि खुशी या स्वेच्छा से दिया गया नेग स्वीकार्य है, लेकिन किसी को डराकर या जबरदस्ती पैसे लेना गैरकानूनी है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद, यदि किन्नर या कोई अन्य व्यक्ति नेग के नाम पर जबरन वसूली या बदसलूकी करता है, तो पीड़ित के पास कानूनी रास्ता एफआईआर का रास्ता उपलब्ध है। यह निर्णय किन्नर समुदाय के परंपरागत अधिकारों की आड़ में होने वाली जबरन वसूली पर रोक लगाता है। अभी तक ऐसे मामलों में पुलिस भी एफआईआर से बचती रही थी क्योंकि कोई स्पस्ट मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं था किन्तु उच्च न्यायालय की द्वय-खंडपीठ द्वारा पारित आदेश ने पुलिस और आम जन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अब आवश्यकता है जन जागरूकता की। निर्णय का आना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है जानकारी का प्रसार।